नागपुर : महाराष्ट्र में भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून में संशोधन करते समय केवल कानूनी पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार, सामाजिक संवेदनशीलता और आधुनिक रणनीतिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखने की जरूरत है। विधान परिषद की उपसभापति डॉ. नीलम गोर्हे ने यह निर्देश देते हुए कहा कि पूरे अधिनियम की गहन समीक्षा करके उचित, सम्मानजनक और समयानुकूल शब्दावली शामिल की जाए।
विधानसभा में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए डॉ. गोर्हे ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में कुछ शब्द आज की सामाजिक समझ से मेल नहीं खाते और उनमें सुधार जरूरी है। उदाहरण के लिए, ‘वेडा’ शब्द के स्थान पर अधिक सम्मानजनक और वैज्ञानिक शब्द ‘मनोरुग्ण’ पर विचार किया जाना चाहिए। ‘विकृतचित्त’ जैसे शब्द आवश्यक न होने पर हटाए जा सकते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून में संशोधन करते समय सामाजिक बदलाव, वैज्ञानिक शोध, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश और केंद्र सरकार के नए कानूनों का व्यापक अध्ययन जरूरी है। उन्होंने निर्देश दिया कि समाज के हर वर्ग के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अधिनियम को अधिक संवेदनशील, संतुलित और मानव-केंद्रित बनाने वाले सभी आवश्यक सुधार किए जाएं तथा शब्दों का प्रयोग इस तरह से हो कि प्रभावित लोगों की गरिमा बनी रहे। बैठक में विधानमंडल के सचिव शिवदर्शन साठे सहित कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
