भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 18,953 वोटों से हराया
पटना : चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तीन दशक पुराने अभेद्य गढ़ को ध्वस्त कर दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन (Nitin Nabin) के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही थी, लेकिन जन सुराज (Jan Suraaj) के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 18,953 मतों के अंतर से जीत हासिल कर बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है।
अंतिम परिणाम के अनुसार प्रशांत किशोर को 63,203 मत मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार (Neeraj Kumar) को 44,250 वोट प्राप्त हुए। राष्ट्रीय जनता दल की उम्मीदवार रेखा कुमारी (Rekha Kumari) 14,085 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। जीत के बाद जन सुराज कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया और प्रशांत किशोर को बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।
1995 से था भाजपा का मजबूत गढ़
बांकीपुर विधानसभा सीट, जिसे पहले पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था, वर्ष 1995 से भाजपा का अभेद्य गढ़ मानी जाती रही है। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा (Naveen Kishore Prasad Sinha) और बाद में उनके पुत्र नितिन नवीन लगातार इस सीट से चुनाव जीतते रहे। 2025 में नितिन नवीन के राज्यसभा जाने और विधानसभा से इस्तीफा देने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी, जिस पर हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।
उम्मीदवार बदलना भाजपा को पड़ा भारी
शुरुआत में भाजपा ने अभिषेक बंटी (Abhishek Bunty) को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन नामांकन के बाद उनके परिवार का नाम चारा घोटाले से जुड़ने की चर्चाओं के बीच उन्होंने चुनाव से अचानक हटने का फैसला किया। इसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार को मैदान में उतारा। माना जा रहा है कि अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने से मतदाताओं के बीच नकारात्मक संदेश गया और इसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा।
प्रशांत किशोर ने बदला चुनाव का एजेंडा
प्रशांत किशोर ने पूरे चुनाव अभियान में स्थानीय मुद्दों, विकास, शिक्षा और रोजगार को केंद्र में रखा। उन्होंने आक्रामक राजनीतिक बयानबाजी से दूरी बनाते हुए सीधे जनता से संवाद किया और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उनकी सकारात्मक चुनावी रणनीति ने मतदाताओं को प्रभावित किया।
भाजपा का अतिआत्मविश्वास बना हार की वजह
बांकीपुर को भाजपा का सुरक्षित गढ़ मानने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में अतिआत्मविश्वास दिखाई दिया। मतदान के दिन भाजपा समर्थकों को बूथ तक लाने में संगठन अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा सका। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने मजबूत बूथ प्रबंधन और माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए अपने समर्थकों को बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचाया।
युवा मतदाताओं का मिला व्यापक समर्थन
विश्लेषकों के अनुसार पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और ‘जेन-ज़ी (Gen Z)’ मतदाताओं का झुकाव जन सुराज की ओर रहा। चुनाव प्रचार के दौरान युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और बेहतर नेतृत्व जैसे मुद्दे प्रमुख रहे, जिसका लाभ प्रशांत किशोर को मिला।
आरजेडी की पारंपरिक वोट बैंक में भी सेंध
2025 के विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाली राष्ट्रीय जनता दल इस उपचुनाव में तीसरे स्थान पर पहुंच गई। माना जा रहा है कि पार्टी के सुस्त चुनाव अभियान और तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की देर से सक्रियता के कारण मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा जन सुराज के पक्ष में चला गया।
यूएन से चुनावी रणनीतिकार और अब विधायक
20 मार्च 1977 को बिहार के रोहतास जिले में जन्मे प्रशांत किशोर ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) समर्थित सार्वजनिक स्वास्थ्य परियोजनाओं में लगभग आठ वर्ष तक काम किया। इसके बाद उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (Indian Political Action Committee-I-PAC) की स्थापना की और देश के कई प्रमुख नेताओं के चुनावी रणनीतिकार बने। वर्ष 2024 में जन सुराज पार्टी की स्थापना के बाद उन्होंने पहली बार स्वयं चुनाव लड़ा और पहली ही कोशिश में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर बिहार की राजनीति में नया अध्याय लिख दिया।
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