मुंबई. महाराष्ट्र के सांस्कृतिक कार्य मंत्री एड. आशिष शेलार ने बुधवार को दो महत्वपूर्ण घोषणाएं करते हुए राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए बड़े कदम उठाए हैं। इन निर्णयों से न सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम का दस्तावेजीकरण होगा, बल्कि हजारों साल पुरानी कातलशिल्प (प्रागैतिहासिक या पाषाण युग के इंसानों द्वारा चट्टानों पर बनाई गई प्राचीन ड्राइंग या नक्काशी) को वैश्विक पहचान दिलाने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है।
मालवण में खुलेगा ‘अध्यासन केंद्र’, चार किलों पर होगा गहन शोध
मंत्री शेलार ने बताया कि सिंधुदुर्ग जिले के ऐतिहासिक सिंधुदुर्ग, पद्मदुर्ग, राजकोट और सर्जेकोट किलों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए मुंबई विश्वविद्यालय के तहत मालवण में एक स्वतंत्र ‘अध्यासन केंद्र’ (पीठ) स्थापित किया जाएगा। इस परियोजना के लिए सांस्कृतिक कार्य विभाग ने 50 लाख रुपए के निधि को मंजूरी दी है। यह केंद्र ऐतिहासिक दस्तावेजों के संकलन, शोध प्रबंधों, व्याख्यानमालाओं और युवा शोधकर्ताओं के मार्गदर्शन का कार्य करेगा। विशेष रूप से, यह उन चारों किलों की विरासत का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण सुनिश्चित करेगा। गौरतलब है कि 12 अप्रैल 2025 को सिंधुदुर्ग किले के 358 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मंत्री शेलार ने इसकी घोषणा की थी। उस समय पालकमंत्री नितेश राणे और स्थानीय विशेषज्ञों ने इस संबंध में प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भेजा था, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है। मंत्री शेलार ने कहा, “शिवकालीन व्यापार के केंद्र रहे इस क्षेत्र के ऐतिहासिक साक्ष्यों का गहन अध्ययन होगा, जिससे छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम और दूरदृष्टि का व्यापक प्रसार होगा। हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक युवा उनके जीवन से प्रेरणा लें।”
कोंकण की प्राचीन कातलशिल्प के लिए ‘वर्ल्ड हेरिटेज डेस्क’ का गठन
इसके साथ ही, मंत्री शेलार ने एक और ऐतिहासिक निर्णय की जानकारी दी। कोंकण तट और पठारों पर पाई जाने वाली हजारों प्राचीन कातलशिल्पों (जियोग्लिफ) के संरक्षण और वैश्विक मान्यता के लिए ‘वर्ल्ड हेरिटेज डेस्क’ की स्थापना की जाएगी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए सरकार ने 14 करोड़ 62 लाख रुपए से अधिक की राशि को प्रशासकीय मंजूरी दे दी है। यह डेस्क वर्ष 2026 से 2029 तक कार्यरत रहेगा, जिसकी दो शाखाएँ मुंबई और रत्नागिरी में खोली जाएंगी। मुंबई शाखा अंतरराष्ट्रीय शोध सामग्री का अध्ययन, डेटाबेस निर्माण और यूनेस्को मानकों के अनुसार नामांकन प्रस्ताव तैयार करेगी। रत्नागिरी शाखा क्षेत्रीय सर्वेक्षण, जीपीएस मैपिंग और ड्रोन के माध्यम से शैलचित्रों का दस्तावेजीकरण करेगी। मंत्री शेलार ने बताया कि कोंकण की इन कातलशिल्पों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार के माध्यम से नामांकन प्रस्ताव भेजा जा रहा है। इसके अलावा, इन प्राचीन चित्रों की सटीक आयु निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण भी किए जाएंगे। मंत्री ने कहा, “ये कातलशिल्प आद्य-ऐतिहासिक मानव की जीवनशैली और संस्कृति को समझने की कुंजी हैं। इनके संरक्षण से न सिर्फ इतिहास जगत के सामने आएगा, बल्कि कोंकण में पर्यटन को भी एक नई दिशा मिलेगी।” इन दोनों निर्णयों से महाराष्ट्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण और संरक्षण को एक नया बल मिलने की उम्मीद है।
पर्यटन और प्रेरणा को मिलेगा बढ़ावा
मंत्री आशीष शेलार के अनुसार, इन प्रयासों से न केवल कोंकण के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियां शिवाजी महाराज के जीवन और हमारे प्राचीन इतिहास से प्रेरणा ले सकेंगी। सरकार इन विरासतों पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की डॉक्यूमेंट्री भी तैयार कराएगी ताकि दुनिया इस प्राचीन कला से परिचित हो सके।

