महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना को समर्पित है। यह पर्व प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से महादेव की पूजा, व्रत और रात्रि जागरण करने से जीवन के समस्त दुख, कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
विष्णु और ब्रह्मा के बीच श्रेष्ठता का विवाद
पुराणों के अनुसार, एक समय सृष्टि में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि सबसे श्रेष्ठ देवता कौन है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का मत था कि चूंकि उन्होंने जगत की रचना की है, इसलिए वे सर्वोच्च हैं। वहीं पालनहार विष्णु का कहना था कि वे ही सृष्टि का पालन करते हैं और ब्रह्मा की उत्पत्ति का आधार भी वही हैं, अतः श्रेष्ठता उन्हीं को प्राप्त है।
यह विवाद धीरे-धीरे तीव्र हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। दोनों देवताओं के इस अहंकारपूर्ण संघर्ष से समस्त देवगण चिंतित हो उठे।
शिव का ज्योतिर्लिंग रूप में प्राकट्य
देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने इस विवाद का अंत करने के लिए एक अनंत अग्निस्तंभ अर्थात ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर दोनों को दर्शन दिए। वह दिव्य स्तंभ इतना विशाल था कि उसका न आदि दिखाई देता था और न ही अंत। तब ब्रह्मा और विष्णु ने एक शर्त रखी—जो भी इस अग्निस्तंभ का छोर पहले खोज लेगा, वही सर्वोच्च माना जाएगा। विष्णु ने वाराह (सूअर) का रूप धारण कर पाताल की ओर प्रस्थान किया, जबकि ब्रह्मा हंस रूप में आकाश की ओर उड़ चले। अनगिनत वर्षों की खोज के बाद भी विष्णु को उस स्तंभ का अंत नहीं मिला। अंततः उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए सत्य को स्वीकार कर लिया।
असत्य का दंड और काल भैरव का प्राकट्य
ब्रह्मा को भी उस ज्योतिर्लिंग का कोई छोर नहीं मिला, किंतु उन्होंने सत्य स्वीकारने के बजाय छल का सहारा लिया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें स्तंभ का आरंभ मिल गया है और अपनी बात सिद्ध करने हेतु केतकी के फूल को झूठी गवाही देने के लिए प्रस्तुत किया।
किन्तु शिव से सत्य छिप नहीं सकता। ब्रह्मा के असत्य से क्रोधित होकर शिव ने काल भैरव का रूप धारण किया और ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया। काल भैरव शिव का उग्र रूप माने जाते हैं। साथ ही, झूठी साक्षी बनने के कारण केतकी के फूल को शिव पूजा में वर्जित कर दिया गया। बाद में ब्रह्मा ने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा याचना की। विष्णु ने भी उनके लिए क्षमा की प्रार्थना की। तब शिव ने कहा कि विष्णु अपनी सत्यनिष्ठा के कारण सदा पूजनीय रहेंगे, किंतु ब्रह्मा के असत्य के कारण उनकी सार्वजनिक पूजा अत्यंत सीमित होगी। यही कारण है कि आज ब्रह्मा के मंदिर बहुत कम देखने को मिलते हैं।
महाशिवरात्रि पर्व की शुरुआत
मान्यता है कि जिस दिन शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, वह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी। उसी पावन रात्रि को पहली बार महाशिवरात्रि के रूप में मनाया गया।
यह पर्व केवल उपवास और पूजा का अवसर नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग, सत्य की विजय और अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर होने का प्रतीक भी है। महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि सत्य, विनम्रता और भक्ति ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का मार्ग हैं।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी केवल मान्यताओं और परंपरागत जानकारियों पर आधारित है. तह की बात किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है.
