मुंबई. रविवार को भाद्रपद पूर्णिमा से पितरों का महापर्व यानी पितृ पक्ष शुरू हो रहा है. पितृ को पितरों अर्थात अपने दिवंगत पूर्वजों को प्रसन्न करने और उनकी कृपा आशीष पाने का सुनहरा अवसर माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि पितृ रूष्ट होते हैं तो इंसान को उसके प्रयासों का उचित फल नहीं मिल पता है. वह और उसका परिवार आर्थिक, मानसिक एवं स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियों में घिरा रहता है. जबकि पितृ प्रसन्न होते हैं तो कृपा आशीष बरसते हैं. व्यक्ति के घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है. इसलिए भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलने वाले (लगभग 15 दिन) पितृ पक्ष में अपने ज्ञात एवं अज्ञात पित्रों के श्राद्ध और तर्पण किए जाने की परंपरा है. इस दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, मोक्ष और परिवार की समृद्धि के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करते हैं. शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान कुछ नियम का पालन करना पड़ता है, नहीं तो पूर्वज नाराज होते है और पितृ दोष भी लग सकता है.
ईश्वर की पूजा जरूरी है
पितृपक्ष के दौरान पितर पूजनीय होते हैं. लेकिन, दौरान घर के भगवान की सेवा करना न भूलें. रोज की तरह भगवान को स्नान कराएं, शृंगार करें और उनकी सेवा करें. जैसे हम रोज सुबह अपने घर में भगवान की पूजा करते हैं, वैसे ही आराधना करते रहें. पितृपक्ष में मंदिर जाने की कोई मनाही नहीं है. लेकिन अगर तीर्थयात्रा पर जाने की सोच रहे हैं तो ये काम अगर पितृ पक्ष के बाद करें तो ज्यादा सही रहेगा.
पितृपक्ष में क्या करना चाहिए-
श्राद्ध कर्म करें.
तर्पण करें.
दान करें.
पशु-पक्षी की सेवा करें.
सात्विक भोजन करें.
नाखून बाल काटना वर्जित
पितृपक्ष में बाल कटवाने से बचना चाहिए क्योंकि यह शोक और पवित्रता का समय होता है और बाल- दाढ़ी और नाखून काटना पितरों के प्रति अनादर माना जाता है. इसलिए नाखुन-बाल न काटें. इसी तरह लहसुन और प्याज का सेवन भी नहीं करना चाहिए क्योंकि इन्हें तामसिक भोजन माना जाता है. मान्यता है कि ऐसी चीजों के सेवन से हमारे विचारों की पवित्रता खत्म हो सकती है. इतना ही नहीं इससे आपका गुस्सा, बढ़ सकता है, मन की एकाग्रता खत्म हो सकती है. इसलिए प्याज और लहसुन नहीं खाना चाहिए. इसके साथ-साथ पितृ पक्ष में मांसाहार, बैंगन, सफेद तिल, लौकी, मूली, अरबी, गाजर, मूली, शलजम, सूरन, शकरकंद, चुकंदर, सरसों का साग, पत्ता गोभी, कुम्हड़ा आदि सब्जियों के साथ साथ मसूर की दाल, काला नमक, चना और सत्तू आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए. किसी भी चीज को कच्चा नहीं खाना चाहिए
ये भी वर्जित है
शुभ कार्य न करें.
तर्पण किए बिना भोजन न करें.
श्राद्ध का मजाक न उड़ाएं.
झूठ न बोंले, क्रोध न करें.
सूर्यास्त के बाद श्राद्ध न करें. क्योंकि इससे पितृ को रुष्ट हो सकते हैं.
पितृपक्ष में संबंध बनाना हो सकता है हानिकारक
शास्त्रों की मानें तो पितृ पक्ष के दौरान गर्भ धारण करने से संतान को सेहत से जुड़ी समस्याएं हो सकती है. पैदा होने वाली संतान विकृत हो सकती है, इन्हीं वजहों से पितृ पक्ष में संभोग नहीं करना चाहिए.
रात में करें कुछ विशेष उपाय
पितृ पक्ष में रात के समय को लेकर कुछ उपाय बताए गए हैं, जिन्हें करने से सभी कष्टों का अंत होता हैं. कर सकते हैं निम्न उपाय
पीपल के नीचे दीपक जलाएं – पितृ पक्ष के दौरान पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना बहुत शुभ होता है. माना जाता है कि पीपल के पेड़ में पितरों का वास होता है. ऐसे में रात के समय, खासकर सर्व पितृ अमावस्या की रात, पीपल के पेड़ के नीचे एक दीपक जरूर जलाएं. इससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है.
दक्षिण दिशा में दीपक रखें – कहते हैं कि घर की दक्षिण दिशा में पितरों का वास होता है. ऐसे में पितृ पक्ष के दौरान रोजाना घर की दक्षिण दिशा में एक दीपक जलाकर रखें. इस दीपक में सरसों का तेल डालें और इसे पितरों को समर्पित करें. ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.
कौए और कुत्तों को भोजन कराएं – रात में भोजन करने से पहले, एक थाली में पितरों के लिए भोजन निकालें और इसे कौए या कुत्तों को खिला दें. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ इन रूपों में भोजन ग्रहण करते हैं. ऐसा करने से पितृ खुश होते हैं और घर में अन्न की कमी नहीं होती है.
पितरों का ध्यान करें – रात को सोने से पहले, शांत मन से अपने पितरों का ध्यान करें. उनके नाम का जाप करें और उनसे अपनी गलतियों के लिए माफी मांगें. इसके साथ ही उनसे अपने जीवन में सुख-शांति बनाए रखने का आशीर्वाद मांगें. यह एक बहुत ही आसान लेकिन शक्तिशाली उपाय है.
डिस्क्लेमर: इस लेख में सिर्फ धार्मिक प्राचीन मान्यताओं के संबंध में जानकारी दी गई है. ‘तह की बात’ समूह इसमें कही गई बातों एवं उपायों की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है. लेख में दी गई जानकारियों पर विश्वास या अविश्वास स्वविवेक से करें.
