बोले, कानून में बदलाव का अधिकार सिर्फ संसद को
मुंबई: महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण (एट्रोसिटी) कानून को लेकर सियासत तेज हो गई है। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री संजय शिरसाट के विधानभवन में दिए गए बयान पर वकील नितीन सातपुते ने कड़ी आपत्ति जताई है। सातपुते ने कहा कि एट्रोसिटी कानून में बदलाव या संशोधन करने का अधिकार केवल संसद को है और इसके लिए लोकसभा व राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। सातपुते ने कहा कि इस विषय की पूरी जानकारी के बिना मंत्री द्वारा दिया गया बयान अपरिपक्वता को दर्शाता है।
सातपुते के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 से जुड़ा हुआ है, जिसका उद्देश्य देश में अस्पृश्यता और जातीय भेदभाव को खत्म करना है। इससे पहले 1955 में नागरिक अधिकार संरक्षण कानून बनाया गया था, लेकिन उसमें कई कमियां थीं। इन्हीं को दूर करने के लिए 1989 में यह विशेष कानून लागू किया गया। उन्होंने बताया कि 2015 में इसमें संशोधन कर कानून को और सख्त बनाया गया था, ताकि दलित और आदिवासी समुदायों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
गिरफ्तारी के नियम पहले से तय
सातपुते ने कहा कि कानून में गिरफ्तारी को लेकर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के कई दिशानिर्देश मौजूद हैं। उन्होंने अर्नेश कुमार बनाम राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि किन मामलों में तुरंत गिरफ्तारी करनी है और किन मामलों में नहीं, यह स्पष्ट रूप से तय किया गया है। उनका कहना है कि ऐसे में मंत्री द्वारा यह कहना कि पुलिस तुरंत गिरफ्तारी न करे, कानून की प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
‘दुरुपयोग’ के तर्क पर सवाल
मंत्री शिरसाट ने विधान परिषद में कहा था कि एट्रोसिटी कानून का कुछ मामलों में दुरुपयोग होता है और इसलिए एफआईआर के बाद तुरंत गिरफ्तारी के बजाय पहले जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। इस पर सातपुते ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर दुरुपयोग के आधार पर कानून बदला जाएगा तो फिर बलात्कार, छेड़छाड़ और पॉक्सो जैसे कानूनों में भी झूठे मामलों के उदाहरण मिलते हैं, तो क्या उन्हें भी खत्म कर देना चाहिए?
समिति बनाकर गिरफ्तारी का प्रस्ताव
शिरसाट ने यह भी सुझाव दिया था कि किसी आरोपी की गिरफ्तारी से पहले समिति की सिफारिश ली जाए। इस पर सातपुते ने कहा कि भारतीय आपराधिक कानून (बीएनएस और बीएनएसएस) में ऐसी किसी समिति का प्रावधान नहीं है और सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस तरह के आदेशों को रद्द कर चुका है।
इस्तीफे की मांग
वकील सातपुते ने कहा कि सामाजिक न्याय विभाग के मंत्री होने के नाते शिरसाट की जिम्मेदारी कानून को और मजबूत बनाने की है। उन्होंने मांग की कि मंत्री अपने बयान पर माफी मांगें, अन्यथा उन्हें पद से इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस कानून में नियमों के खिलाफ कोई आदेश जारी किया गया तो उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।
आंकड़ों में एट्रोसिटी कानून
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार देश में हर साल एट्रोसिटी कानून के तहत 50 हजार से अधिक मामले दर्ज होते हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं। महाराष्ट्र में हर साल लगभग 2500 से 3000 मामले दर्ज होते हैं, जबकि मुंबई में यह संख्या 150 से 200 के बीच रहती है। हालांकि, इन मामलों में सजा की दर लगभग 25 से 30 प्रतिशत ही है और बड़ी संख्या में केस अदालतों में लंबे समय तक लंबित रहते हैं।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कानून का उद्देश्य दलित और आदिवासी समुदाय को सुरक्षा देना है। साथ ही यह भी जरूरी है कि झूठे मामलों से निर्दोष लोगों को बचाने के लिए जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो। वहीं दलित संगठनों ने आशंका जताई है कि गिरफ्तारी में देरी से पीड़ितों को न्याय मिलने में बाधा आ सकती है।
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