मुंबई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में स्वातंत्र्यवीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि वीर सावरकर को यह सम्मान दिया जाए तो ‘भारत रत्न’ पुरस्कार की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। यह पहली बार है जब ‘आरएसएस’ प्रमुख ने सावरकर के लिए भारत रत्न की मांग को लेकर सार्वजनिक रूप से बयान दिया है।
‘आरएसएस’ (संघ) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में मुंबई के वरली स्थित नेहरू सेंटर सभागृह में दो दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। ‘संघ’ का 100 वर्षों का सफर-नए क्षितिज’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में बॉलीवुड सहित विभिन्न क्षेत्रों के मान्यवर, स्वयंसेवक और नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे. कार्यक्रम के दूसरे दिन भागवत ने स्वयंसेवकों को मार्गदर्शन दिया और विभिन्न सामाजिक व राजकीय मुद्दों पर अपने विचार रखे।
किसी भी जाति का हिंदू बन सकता है सरसंघचालक
जातिव्यवस्था और ‘संघ’ की कार्यप्रणाली पर बोलते हुए भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ प्रमुख बनने के लिए हिंदू होना अनिवार्य है, लेकिन वह किसी भी जाति का हो सकता है। उन्होंने कहा, “अनुसूचित जाति या जनजाति से होना कोई अयोग्यता नहीं है और न ही ब्राह्मण होना कोई विशेष योग्यता है। सरसंघचालक के पद के लिए चुनाव नहीं होता, बल्कि क्षेत्रीय और मंडल प्रमुख इसकी नियुक्ति करते हैं।” भागवत ने बताया कि जब संघ की स्थापना हुई थी तो इसका काम ब्राह्मण बहुल समुदाय में शुरू हुआ था, इसलिए शुरुआती दौर में अधिकतर संस्थापक ब्राह्मण थे। लेकिन अब ‘संघ’ का काम भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर बढ़ रहा है, न कि जाति-पाति के आधार पर।
75 की उम्र पार करने के बाद भी जारी रहेगा काम
अपनी उम्र और पद के बारे में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा, “मैंने 75 साल पूरे कर लिए हैं और संगठन को इसकी जानकारी दे दी है। आम तौर पर कहा जाता है कि 75 साल की उम्र के बाद बिना पद के काम करना चाहिए, लेकिन संगठन ने मुझसे काम जारी रखने को कहा है। जब भी ‘आरएसएस’ मुझसे पद छोड़ने को कहेगा, मैं ऐसा कर दूंगा, लेकिन मेरा काम अंतिम समय तक जारी रहेगा. काम से रिटायरमेंट कभी नहीं होगा।”
बांगलादेश में हिंदुओं पर बड़ी टिप्पणी
बांगलादेश में हिंदुओं की स्थिति पर बोलते हुए भागवत ने कहा, “बांगलादेश में सवा करोड़ हिंदू हैं। अगर वे एकत्र आकर लड़ने का निर्णय लेते हैं और पीछे नहीं हटते, तो दुनिया भर के हिंदू उनकी मदद करेंगे। हमें सजग रहना चाहिए।”
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर प्रतिक्रिया
भारत-अमेरिका व्यापार करार के बारे में भागवत ने कहा कि अगर यह करार भारत के हित में है तो उसका स्वागत है। उन्होंने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय करार करते समय देश के आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा करनी चाहिए।”
भाषावाद और भ्रष्टाचार पर विचार
भाषा के मुद्दे पर भागवत ने स्पष्ट किया कि अंग्रेजी भाषा से कोई वैर नहीं है। उन्होंने कहा, “जहां अंग्रेजी के बिना काम नहीं चल सकता, वहां हम इसका उपयोग कर सकते हैं, लेकिन संघ का काम हमेशा भारतीय भाषाओं में होगा।” भ्रष्टाचार पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “भ्रष्टाचार व्यवस्था में नहीं, मनुष्य के मन में होता है। संघ का काम संस्कार देना है। हमारे स्वयंसेवक गरीब होने के बावजूद भ्रष्टाचार नहीं करते।” रोजगार के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि शिक्षित वर्ग को खेती की ओर लौटना चाहिए और गांवों में ही ‘प्रोसेसिंग यूनिट’ लगानी चाहिए।
2047 में अखंड भारत का विजन
भागवत ने विश्वास व्यक्त किया कि 2047 में अखंड भारत का उदय होगा। उन्होंने कहा, “भारत को तोड़ने का विचार करने वाले खुद टूट जाएंगे। 200 वर्षों में अंग्रेज भारत को तोड़ नहीं सके। अब भारत को तोड़ना संभव नहीं है।”
आरक्षण पर संघ का स्पष्ट रुख
संवैधानिक आरक्षण पर बोलते हुए भागवत ने कहा, “भारतीय संविधान द्वारा दिए गए आरक्षण का ‘संघ’ समर्थन करता है। इसे तब तक जारी रखना चाहिए जब तक समाज के वंचित तबके में इसकी आवश्यकता खत्म नहीं हो जाती है। जिस दिन जरूरत खत्म हो जाए, तब लाभार्थियों को खुद यह कहना चाहिए ताकि जरूरतमंदों को लाभ मिल सके।”
संघ की कार्यप्रणाली और चुनौतियों पर चर्चा
मुस्लिम बहुल इलाकों में काम करने वाले स्वयंसेवकों के अनुभवों को साझा करते हुए भागवत ने कहा कि विरोध और अपशब्द सहने के बाद भी संवाद और सेवा से ही विश्वास बनता है। संघ के वित्त पोषण के बारे में उन्होंने स्वयंसेवकों के योगदान और गुरुदक्षिणा को मुख्य स्रोत बताया। इस मौके पर उन्होंने बांग्लादेशी और अन्य अवैध विदेशी घुसपैठियों की कड़ी जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
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