दशकों बाद भी नहीं थमा कुपोषण का संकट
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेलघाट में कुपोषण से हो रही लगातार मौतों पर महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने इसे “त्रासदी” बताते हुए कहा कि वर्षों के हस्तक्षेप के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।
1993 से लंबित हैं जनहित याचिकाएं
अदालत कार्यकर्ता डॉ. राजेंद्र बुरमा और बंडू संपतराव साने द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में कुपोषण, स्टाफ की कमी, खराब स्वास्थ्य ढांचा और बढ़ती बाल मृत्यु दर जैसे गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि 1993 से लंबित इन मामलों से साफ है कि नीतियां जमीन पर लागू नहीं हो पा रही हैं।
“सिर्फ भाषण नहीं, जमीन पर काम चाहिए”
न्यायालय ने सरकार की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि “कागजों और रिपोर्टों का ढेर है, लेकिन जमीनी सुधार नहीं दिखता।”
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा— “सिर्फ उपदेश नहीं, उन्हें काम में बदलें।”
जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा भोजन
याचिकाकर्ताओं के वकील ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि योजनाओं पर भारी खर्च हो रहा है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में पोषण की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं।
इस पर सहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा, “जिन्हें भोजन की जरूरत है, उन्हें नहीं मिल रहा। बच्चों की पसलियां दिख रही हैं, वे खड़े तक नहीं हो पा रहे।”
धारणी में 300 बेड अस्पताल पर भी सवाल
अदालत ने धारणी में प्रस्तावित 300 बेड के अस्पताल में हो रही देरी पर भी गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने सरकार से पूछा— “भूमिपूजन की तारीख बताइए” और चेतावनी दी कि अब और देरी स्वीकार नहीं होगी। न्यायमूर्ति घुगे ने कहा कि जब उन्होंने वकालत शुरू की थी तब भी अस्पताल का वादा किया गया था, लेकिन आज तक पूरा नहीं हुआ।
जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
मेलघाट में 26 वर्षों से काम कर रहे डॉक्टर आशीष सातव ने अदालत को बताया कि आदिवासी समुदायों में पोषण, स्वच्छता और बच्चों की देखभाल को लेकर जागरूकता की भारी कमी है।
उन्होंने कहा कि लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य आदतों और पोषण के बारे में शिक्षित करना जरूरी है।
खून तक खरीदना पड़ रहा
डॉ. सातव ने एक मामले का जिक्र करते हुए बताया कि एक मरीज का हीमोग्लोबिन स्तर बेहद कम था और खून के लिए पैसे जुटाने पड़े।
उन्होंने सरकार से रक्त मुफ्त उपलब्ध कराने की मांग की।
युवाओं में भी कुपोषण और एनीमिया का असर
कोर्ट को बताया गया कि कुपोषण और एनीमिया का असर केवल बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि 16 से 24 वर्ष के युवाओं में भी यह समस्या गंभीर है, जिससे मृत्यु दर बढ़ रही है। साथ ही पीने के पानी और बिजली की समस्याएं भी सामने आईं।
दो हफ्ते में मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी सिफारिशों की समीक्षा कर ठोस कदमों की जानकारी दे। अदालत ने कहा— “20 साल बाद ऐसी मौतें रुक जानी चाहिए थीं। हम एक प्रगतिशील राज्य हैं।” अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version