‘भाजपा का तीखा हमला
जनसंख्या और धार्मिक पहचान पर बयान से छिड़ा विवाद
मुंबई : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के सदस्य मौलाना खालिलुर रहमान सज्जाद नोमानी के एक बयान ने देशभर में नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस्लामिक समिट में दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने दावा किया कि भारत में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता। उनके इस बयान के वायरल होने के बाद धार्मिक पहचान, जनसंख्या वर्गीकरण और सामाजिक सौहार्द को लेकर बहस तेज हो गई है।
कई समुदायों को हिंदू मानने पर उठाया सवाल
मौलाना नोमानी ने कहा कि अनुसूचित जाति, आदिवासी, सिख, ईसाई, बौद्ध, लिंगायत और तमिलनाडु के लोगों की अलग पहचान है, इसलिए उन्हें हिंदू आबादी का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट समुदाय के कुछ लोगों ने स्वयं को सरकारी रिकॉर्ड में सिख के रूप में दर्ज कराने की घोषणा की है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में उन्होंने कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।
‘30 वर्षों के अध्ययन’ का किया दावा
अपने भाषण में मौलाना नोमानी ने कहा कि उन्होंने तीन दशक तक देशभर में यात्रा और अध्ययन किया है। उनके अनुसार, भारत की सामाजिक और धार्मिक संरचना को लेकर आम धारणा सही नहीं है और मीडिया के आधार पर देश की वास्तविक स्थिति को समझना संभव नहीं है।
‘सेक्युलर और सांप्रदायिक हिंदू’ की राजनीति पर भी टिप्पणी
मौलाना ने कहा कि मुस्लिम समाज द्वारा हिंदुओं को ‘सेक्युलर’ और ‘सांप्रदायिक’ वर्गों में बांटकर देखने की सोच नुकसानदायक साबित हुई। उनका दावा था कि इस राजनीतिक सोच का अंततः मुस्लिम समाज को ही नुकसान हुआ।
भाजपा ने बताया समाज को बांटने की कोशिश
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने मौलाना नोमानी के बयान की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बयान समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश है। पूनावाला ने दावा किया कि कुछ राजनीतिक दल हिंदुओं को विभिन्न वर्गों में विभाजित कर मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करने की राजनीति करते हैं। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस पर भी इसी तरह की राजनीति करने का आरोप लगाया।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
मौलाना नोमानी के बयान और भाजपा की प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं, जबकि यह मामला धार्मिक पहचान और राजनीतिक विमर्श का नया केंद्र बन गया है।
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