परिचित-अपनों के बीच अचानक बढ़े अपराध
मुंबई: मुंबई में पिछले दो महीनों के दौरान हत्या के 20 मामले सामने आए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर मामलों में आरोपी पीड़ित के परिचित—दोस्त, रिश्तेदार या जान-पहचान वाले ही निकले। पुलिस ने लगभग सभी मामलों को सुलझाते हुए आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन इस तरह के अचानक होने वाले अपराध चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।
पुलिस आंकड़ों के मुताबिक, अधिकतर हत्याएं मामूली विवादों से शुरू होकर हिंसा में बदल जाती हैं, खासकर झुग्गी और आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों में। भीड़भाड़, आर्थिक दबाव, निजी स्पेस की कमी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव ऐसे अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं।
शहर के अलग-अलग इलाकों में चौंकाने वाले मामले
मुंबई के कई इलाकों में हाल ही में सामने आए मामलों ने इस प्रवृत्ति को उजागर किया है—
सायन में पति ने शक और घरेलू विवाद में पत्नी की हत्या कर दी।
मानखुर्द में सिगरेट के पैसे देने से इनकार पर दोस्त ने युवक की जान ले ली।
मलाड में रोड रेज के दौरान कैब ड्राइवर ने बाइक सवार की हत्या कर दी।
धारावी में माचिस देने से इनकार पर तीन नाबालिगों ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी।
विले पार्ले में बहन को बचाने की कोशिश में युवक की जान गई।
भांडुप में दोस्तों ने ही 14 साल के लड़के की हत्या कर दी।
गोवंडी में शक के चलते महिला ने एक युवती को गोली मार दी।
जुहू में अवैध संबंध के मामले में हत्या कर शव के टुकड़े किए गए।
प्रभादेवी में सहकर्मी ने गाली-गलौज से तंग आकर हत्या कर दी।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि अधिकांश अपराध गुस्से और भावनात्मक उबाल में बिना योजना के हो रहे हैं।
हत्या के प्रयास के मामले भी चिंताजनक
आंकड़ों के अनुसार, जहां हत्या के मामलों का खुलासा तेजी से हो रहा है, वहीं हत्या के प्रयास के मामले हर साल 300 के पार बने हुए हैं।
2025 में 126, 2024 में 107 और 2023 में 123 हत्याएं दर्ज की गई थीं, जिनमें ज्यादातर मामलों का खुलासा हुआ।
कानूनी नजरिया: सिर्फ “अचानक गुस्सा” नहीं
सीनियर एडवोकेट सयाजी नांगरे के अनुसार, इन अपराधों को केवल “अचानक गुस्से” से नहीं जोड़ा जा सकता।
उन्होंने बताया कि कई मामलों में लंबे समय से चला आ रहा मानसिक या भावनात्मक दबाव एक सीमा के बाद हिंसा में बदल जाता है।
कानून में भी “गंभीर और अचानक उकसावे” की परिभाषा अब विस्तृत हो चुकी है, जिसमें पुराने रिश्तों और तनाव को भी ध्यान में रखा जाता है।
मनोवैज्ञानिक कारण: गुस्से में दिमाग काम करना बंद करता है
मनोचिकित्सक डॉ. राजेंद्र बर्वे के मुताबिक, ऐसे अपराध पहले से योजनाबद्ध नहीं होते। उन्होंने बताया कि गुस्से के समय दिमाग का “एमिग्डाला” सक्रिय हो जाता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता दब जाती है और व्यक्ति हिंसक प्रतिक्रिया दे सकता है। तनाव, हताशा और दबे हुए भाव ऐसे हालात को और गंभीर बना देते हैं।
रोकथाम सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि पुलिस अपराध सुलझाने में सफल हो रही है, लेकिन इस तरह के अचानक और भावनात्मक अपराधों को रोकना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और बेहतर जीवन स्थितियों पर ध्यान देना ही इसका दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।
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