भारत समेत एशियाई देशों के लिए IEA की चेतावनी
मुंबई : अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आई) ने चेतावनी दी है कि यदि आने वाले कुछ सप्ताहों में हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह और बिना किसी शर्त के नहीं खोला गया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के दौर में प्रवेश कर सकती है। एजेंसी के अनुसार इसका सबसे बड़ा असर भारत सहित एशिया की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है, जो तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं।
ऊर्जा बाजार पर संकट के बादल
एक साक्षात्कार में आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा कि एजेंसी मौजूदा स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। उन्होंने बताया कि ईरान संघर्ष के बाद बाजार को स्थिर रखने के लिए पहले ही रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल भंडार जारी किया जा चुका है। फिलहाल अतिरिक्त आपातकालीन तेल भंडार बाजार में छोड़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक बने हुए हैं।
संघर्ष से पहले के मुकाबले काफी ऊंचे हैं तेल के दाम
बिरोल ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें अभी भी संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर से काफी अधिक बनी हुई हैं। इससे तेल आयात करने वाले देशों पर अतिरिक्त ऊर्जा लागत का बोझ बढ़ गया है। बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण महंगाई का दबाव भी बढ़ रहा है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर रही है और यह संकट हाल के इतिहास में सबसे गंभीर संकटों में से एक साबित हो सकता है।
पिछले तीन बड़े ऊर्जा संकटों से भी गंभीर स्थिति
आईईए प्रमुख के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में दुनिया ने तीन बड़े ऊर्जा संकट देखे हैं। इनमें 1973 का तेल संकट, 1979 का दूसरा तेल संकट और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उत्पन्न तेल एवं प्राकृतिक गैस संकट शामिल हैं। बिरोल का कहना है कि वर्तमान ईरान युद्ध के कारण तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में जो नुकसान हुआ है, वह इन तीनों संकटों के दौरान हुए कुल नुकसान से भी अधिक हो सकता है। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।
तेजी से घट रहे हैं वैश्विक भंडार
फातिह बिरोल ने बताया कि संघर्ष की शुरुआत में बाजार को अतिरिक्त उत्पादन और उपलब्ध भंडारों का सहारा मिला था। सरकारों और कंपनियों के पास मौजूद भंडारों ने तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की। हालांकि अब स्थिति बदल रही है। सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर उपलब्ध भंडार लगातार कम हो रहे हैं। बिरोल ने इसकी तुलना ऐसे व्यक्ति से की, जिसकी जेब में रखा पैसा खत्म होता जा रहा हो और नई आय का कोई स्रोत न हो। उनके अनुसार ऊर्जा बाजार में भी कुछ ऐसी ही स्थिति बन रही है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा जोखिम
आईईए ने विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता जताई है। बिरोल ने कहा कि यदि जून के अंत तक तथा जुलाई और अगस्त के दौरान यह समुद्री मार्ग पूरी तरह नहीं खुलता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा और बढ़ जाएगा। गर्मी और पर्यटन के मौसम में दुनिया भर में हवाई यात्रा, निजी वाहनों, बस परिवहन और माल ढुलाई के कारण ईंधन की मांग तेजी से बढ़ती है। ऐसे समय में आपूर्ति बाधित होने से तेल बाजार पर भारी दबाव पड़ सकता है।
दुनिया ‘रेड ज़ोन’ में पहुंच सकती है
बिरोल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शर्त के पूरी तरह नहीं खोला गया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था ‘रेड ज़ोन’ में प्रवेश कर सकती है। इसका अर्थ है कि दुनिया को ऊर्जा आपूर्ति, महंगाई और आर्थिक विकास के मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत समेत एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा असर
आईईए का मानना है कि एशिया के कई देश तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा, ईंधन कीमतों में वृद्धि और बढ़ती महंगाई का सबसे बड़ा असर इसी क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के लिए आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति ही तय करेगी कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था आने वाले महीनों में किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

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