विधानसभा में पेश हुआ ‘महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’
धोखाधड़ी या प्रलोभन से धर्म बदलने पर भारी जुर्माना और कारावास

मुंबई: राज्य में जबरन या प्रलोभन देकर किए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए तैयार किए गए ‘महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ को महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को विधानसभा में पेश करने का निर्णय लिया है। यह विधेयक, जिसे पिछले सप्ताह कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है, राज्य में अपनी तरह का सबसे कठोर कानून साबित हो सकता है।
प्रस्तावित विधेयक के मसौदे के अनुसार, अवैध या जबरन धर्मांतरण के दोषी पाए जाने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। विधेयक की धारा 9 में अपराध और सजा का उल्लेख है। इसके उपखंड (4) के तहत, यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी या जबरदस्ती से किसी का धर्म बदलवाता है, तो उसे 7 साल तक के कारावास और 5 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। वहीं, धारा 14 में ऐसे अपराधों में शामिल संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है।
लव जिहाद’ पर लगेगी लगाम
राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून ‘लव जिहाद’ जैसी कुप्रथाओं पर प्रभावी रोक लगाने के लिए आवश्यक है। सरकार का तर्क है कि राज्य में प्रलोभन देकर या जबरन धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिन्हें नियंत्रित करना जरूरी है। इस विधेयक को तैयार करने के लिए 14 फरवरी 2025 को पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया गया था। समिति ने अन्य राज्यों के समान कानूनों का अध्ययन करने के बाद यह मसौदा तैयार किया। विधानसभा से पारित होने के बाद यह विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा और उनकी मंजूरी के बाद पूरे राज्य में लागू हो जाएगा।
यह महिलाओं के अधिकारों पर हमला’ – विपक्ष
दूसरी ओर, इस विधेयक का सामाजिक और नागरिक संगठनों ने कड़ा विरोध किया है। करीब 35 संगठनों ने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है। मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने कहा, “यह कानून जीवन के अधिकार, निजता और धर्म की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।” उन्होंने कहा कि वह इस तरह के कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुकी हैं। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की अधिवक्ता लारा जेसानी ने कहा, “धर्म की स्वतंत्रता में धर्म बदलने का अधिकार भी शामिल है। यह कानून पितृसत्तात्मक सोच वाले समाज में महिलाओं के निजी फैसलों में दखल का एक हथियार बन सकता है।” उन्होंने आशंका जताई कि परिवार के सदस्य या स्वयंभू संगठन इस कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं।
डॉमिनिक सैवियो फर्नांडीस ने कहा, “नाम धर्म स्वातंत्र्य है, लेकिन प्रावधान उसे सीमित करते हैं। धर्मांतरण एक वयस्क का निजी निर्णय है, जो परिवार या सरकार के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए।” विरोधियों का यह भी दावा है कि नए कानून में धर्मांतरण से पहले 60 दिन का नोटिस देना, प्रशासन से अनुमति लेना और 25 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य हो सकता है, जिससे प्रक्रिया बेहद जटिल हो जाएगी।

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