मुंबई: देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव का बिगुल बजते ही महाराष्ट्र की सियासत गरमा गई है। इस बार का चुनाव महज सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट कर दिया है कि वे बीएमसी में भाजपा का मेयर देखना चाहते हैं, जिसके लिए वे एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे अपनी खोई हुई सत्ता वापस पाने के लिए अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ हाथ मिलाते नजर आ रहे हैं।

मराठी वोटों का गणित और राज-उद्धव का साथ

मुंबई की राजनीति का केंद्र हमेशा से ‘मराठी मानुस’ रहा है। बीएमसी के कुल 227 वार्डों में से 138 वार्ड ऐसे हैं जहाँ मराठी भाषियों का दबदबा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आते हैं, तो मराठी वोटों का सीधा ध्रुवीकरण उनके पक्ष में होगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान एकनाथ शिंदे की शिवसेना को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि शिंदे गुट भी उसी मराठी वोट बैंक पर अपना दावा ठोकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन के चलते महाविकास अघाड़ी (MVA) के मुंबई में एक साथ चुनाव लड़ने की संभावना खत्म हो गई है।

समीकरण: किसके पास कितने ‘पूर्व नगरसेवक’?

2017 के चुनाव के बाद से शिवसेना में हुई टूट ने समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। वर्तमान में दलों की स्थिति कुछ इस प्रकार है:

पार्टी2017 की जीतवर्तमान स्थिति (पूर्व नगरसेवक)
भाजपा8288 (अन्य दलों के साथ)
शिंदे सेना62 (46 उद्धव गुट + 16 अन्य)
उद्धव सेना8447 (37 मूल + 10 अन्य)
कांग्रेस31अस्तित्व की लड़ाई

हालाँकि शिंदे गुट के पास पूर्व नगरसेवकों की संख्या अधिक है, लेकिन जमीनी स्तर पर शाखा प्रमुख और कार्यकर्ता आज भी बड़ी संख्या में उद्धव ठाकरे के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

सीटों का पेच: 100 बनाम 160

महायुति के भीतर सीटों का बंटवारा एक बड़ी चुनौती है। भाजपा 160 से 170 सीटों पर चुनाव लड़कर अपना मेयर बनाना चाहती है, जबकि शिंदे सेना 100 सीटों की मांग कर रही है। सूत्रों की मानें तो शिंदे गुट को 60 से 70 सीटों पर समझौता करना पड़ सकता है। भाजपा की रणनीति उन बागियों पर भी नजर रखने की है जो टिकट न मिलने पर राज-उद्धव गुट की ओर रुख कर सकते हैं।

निर्णायक होंगे 1.03 करोड़ मतदाता

मुंबई की मतदाता सूची में भारी वृद्धि हुई है। पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार 11.63 लाख नए मतदाता जुड़े हैं।

  • कुल मतदाता: 1,03,44,315
  • पुरुष: 55.16 लाख | महिलाएं: 48.26 लाख
  • जनसांख्यिकी: 138 वार्डों में मराठी भाषी (51% से 84% तक प्रभाव), 47 वार्डों में मुस्लिम समुदाय, और 28 वार्डों में गुजराती/राजस्थानी समुदाय निर्णायक भूमिका में है।

विरोधियों की चाल: कांग्रेस और एनसीपी की स्थिति

मुंबई में शरद पवार और अजीत पवार की एनसीपी का प्रभाव सीमित रह गया है। वहीं कांग्रेस अपने दलित और मुस्लिम वोट बैंक को बचाने की कोशिश में है। भाजपा की एक ‘परदे के पीछे’ की रणनीति यह भी है कि नवाब मलिक को आगे कर मुस्लिम बहुल इलाकों में उम्मीदवार उतारे जाएं, ताकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के वोटों का बंटवारा हो सके।

निष्कर्ष: उद्धव का ‘नया चेहरा’ कार्ड

उद्धव ठाकरे इस बार युवाओं पर दांव लगा रहे हैं। चर्चा है कि वे 70% नए चेहड़ों को चुनावी मैदान में उतारेंगे, जिनकी उम्र 30 से 45 वर्ष के बीच होगी। राज और उद्धव की जोड़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती टिकटों का सही वितरण और भितरघात से बचना होगा। यदि यह दोनों भाई सफलतापूर्वक एक साथ मंच पर आते हैं, तो मुंबई की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी, यह देखना बेहद रोचक होगा।

मुंबई महानगरपालिका (BMC) के 138 मराठी बहुल वार्डों का गणित समझना सबसे जरूरी है, क्योंकि यही वे सीटें हैं जो तय करेंगी कि मेयर किसका होगा। आइए, इन क्षेत्रों के समीकरणों का एक विस्तृत विश्लेषण करते हैं:

1. मराठी हृदयस्थल: दादर, परेल और लालबाग (G-South और G-North वार्ड)

यह शिवसेना का पारंपरिक गढ़ रहा है। यहाँ की खास बात यह है कि यहाँ का वोटर ‘पार्टी’ से ज्यादा ‘इमोशन’ और ‘शाखा’ से जुड़ा है।

  • उद्धव-राज फैक्टर: अगर ये दोनों साथ आते हैं, तो यहाँ विपक्षी दलों (भाजपा-शिंदे) के लिए सेंध लगाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। राज ठाकरे की सभाओं का सबसे ज्यादा असर इसी बेल्ट में दिखता है।
  • शिंदे सेना की चुनौती: सदा सरवणकर जैसे दिग्गज जो शिंदे गुट में गए हैं, उन्हें यहाँ कड़ी टक्कर मिलेगी क्योंकि जमीनी कार्यकर्ता (कैडर) अभी भी ‘मातोश्री’ के प्रति वफादार दिख रहा है।

2. उपनगरों का दबदबा: अंधेरी, विलेपार्ले और बोरीवली (K और R वार्ड)

यहाँ मुकाबला त्रिकोणीय है क्योंकि यहाँ मराठी वोटरों के साथ-साथ गुजराती और राजस्थानी वोटरों की संख्या भी निर्णायक है।

  • भाजपा की रणनीति: भाजपा यहाँ अपने ‘कोर’ गुजराती वोट बैंक और शिंदे सेना के जरिए कुछ मराठी वोटों को जोड़कर 100+ सीटें जीतने का सपना देख रही है।
  • बदलाव: अंधेरी जैसे इलाकों में जहाँ 11 लाख से ज्यादा नए वोटर जुड़े हैं, वहाँ युवा वोटर (जो शायद पहली बार वोट देंगे) उद्धव ठाकरे के ‘70% नए चेहरे’ वाले फॉर्मूले की तरफ आकर्षित हो सकते हैं।

3. निर्णायक मुस्लिम और उत्तर भारतीय बेल्ट: गोवंडी, मानखुर्द और कुर्ला (M और L वार्ड)

इन इलाकों में लगभग 47 वार्ड ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं।

  • नवाब मलिक फैक्टर: भाजपा की रणनीति के अनुसार, अगर नवाब मलिक यहाँ से उम्मीदवार उतारते हैं, तो वे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के वोटों में बंटवारा करेंगे। इसका सीधा फायदा ‘महायुति’ को मिल सकता है।
  • उद्धव सेना को उम्मीद: उद्धव ठाकरे की बदली हुई छवि के कारण मुस्लिम समाज का एक हिस्सा अब उनकी ओर भी झुक रहा है, जो पहले कभी शिवसेना को वोट नहीं देता था।

4. वोटों का नया विभाजन (Data Insights)

क्षेत्र/वोटरप्रभावमुख्य दावेदार
मराठी भाषी138 वार्डउद्धव+राज बनाम शिंदे
मुस्लिम47 वार्डकांग्रेस बनाम सपा बनाम मलिक फैक्टर
गुजराती/राजस्थानी28 वार्डमुख्य रूप से भाजपा
उत्तर भारतीय10% वार्डभाजपा बनाम कांग्रेस

बड़ा खतरा: ‘बगावत’ (Rebellion)

मुंबई में भाजपा और शिंदे सेना के बीच सबसे बड़ी समस्या टिकट बंटवारा होगी। भाजपा 160+ सीटों पर लड़ना चाहती है। अगर शिंदे सेना के पुराने नगरसेवकों का टिकट कटता है, तो वे सीधे राज या उद्धव ठाकरे के पास जा सकते हैं। कार्यकर्ताओं में यह डर है कि “अगर हम शिंदे के साथ गए और टिकट नहीं मिला, तो राजनीतिक भविष्य खत्म हो जाएगा।”

निष्कर्ष

मुंबई की सत्ता का रास्ता अंधेरी, कुर्ला और दादर से होकर गुजरता है। यदि राज और उद्धव मिलकर ‘मराठी अस्मिता’ का मुद्दा उठाते हैं, तो यह महायुति के ‘विकास’ और ‘हिंदुत्व’ के नैरेटिव पर भारी पड़ सकता है।

मुंबई महानगरपालिका के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल क्षेत्रों में से एक दादर (G-North वार्ड) और अंधेरी (K-East/West वार्ड) के समीकरणों पर एक नजर डालते हैं। ये दोनों क्षेत्र मुंबई की राजनीति की दिशा तय करते हैं।


1. दादर-माहिम (G-North वार्ड): शिवसेना का शक्ति केंद्र

दादर वह इलाका है जहाँ शिवसेना का जन्म हुआ और राज ठाकरे की मनसे का मुख्यालय भी यहीं है। यहाँ की जीत ‘प्रतिष्ठा’ की लड़ाई होती है।

पिछले चुनावी नतीजे (2017) और स्थिति:

  • दबदबा: 2017 में यहाँ शिवसेना (अविभाजित) और मनसे के बीच कड़ी टक्कर थी।
  • प्रमुख चेहरा: सदा सरवणकर (वर्तमान में शिंदे सेना के साथ)।
  • चुनौती: दादर का मराठी वोटर ‘पार्टी’ से ज्यादा ‘ठाकरे’ उपनाम से जुड़ा है। शिंदे सेना के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यहाँ के कैडर को अपनी ओर खींचना है।
  • राज-उद्धव प्रभाव: यदि ये दोनों भाई साथ आते हैं, तो दादर में विपक्ष के पास केवल भाजपा का ठोस मध्यमवर्गीय वोट बचेगा, जो जीत के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

मुख्य संभावित उम्मीदवार:

  1. शिंदे सेना: सदा सरवणकर (पुराना अनुभव और वर्तमान विधायक)।
  2. उद्धव सेना: महेश सावंत (जमीनी पकड़ वाले कट्टर शिवसैनिक)।
  3. मनसे: संदीप देशपांडे (अगर गठबंधन नहीं हुआ तो) या उद्धव गुट के साथ तालमेल में नया चेहरा।

2. अंधेरी पूर्व और पश्चिम (K-East और K-West वार्ड): मिनी मुंबई

अंधेरी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ मराठी, उत्तर भारतीय, मुस्लिम और ईसाई मतदाता बड़ी संख्या में हैं। यहाँ की राजनीति ‘कॉस्मोपॉलिटन’ है।

पिछले चुनावी नतीजे (2017) और स्थिति:

  • वर्चस्व: यहाँ भाजपा और शिवसेना के बीच कांटे की टक्कर रही है। 2017 में भाजपा ने यहाँ अपनी ताकत काफी बढ़ाई थी।
  • निर्णायक फैक्टर: यहाँ उत्तर भारतीय और मुस्लिम वोट बैंक निर्णायक है।
  • हालिया उप-चुनाव: अंधेरी पूर्व के उप-चुनाव में ऋतुजा लटके (उद्धव गुट) की जीत ने साबित किया कि यहाँ सहानुभूति और पार्टी का पुराना आधार अभी भी मजबूत है।

मुख्य संभावित उम्मीदवार और समीकरण:

  1. उद्धव सेना: ऋतुजा लटके या नए युवा चेहरे (अंकित प्रभु का नाम चर्चा में है)।
  2. भाजपा: यहाँ भाजपा मुरजी पटेल जैसे नेताओं के दम पर गुजराती और उत्तर भारतीय वोटों को एकजुट करने की कोशिश करेगी।
  3. कांग्रेस: इस क्षेत्र में कांग्रेस का भी अपना जनाधार है, जो त्रिकोणीय मुकाबले में शिंदे सेना या भाजपा का खेल बिगाड़ सकता है।

वार्ड-वार रणनीतिक तुलना

क्षेत्रमुख्य मुद्दाकिसका पलड़ा भारी?
दादर (G-North)मराठी अस्मिता और शाखा संस्कृतिराज-उद्धव गठबंधन (अगर हुआ तो)
अंधेरी (K-East)इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्लम रिडेवलपमेंटउद्धव सेना (सहानुभूति फैक्टर)
अंधेरी (West)ट्रैफिक और शहरी सुविधाएंभाजपा (मध्यम वर्ग और व्यापारियों का समर्थन)

सबसे बड़ा खतरा: ‘बंडखोरी’ (Rebellion)

अंधेरी जैसे क्षेत्रों में भाजपा और शिंदे सेना के बीच सीटों का बंटवारा सबसे कठिन होगा। यदि भाजपा यहाँ ज्यादा सीटों पर लड़ती है, तो शिंदे सेना के पूर्व नगरसेवक (जो शिवसेना छोड़कर आए थे) बागी होकर निर्दलीय या उद्धव सेना के समर्थन से चुनाव लड़ सकते हैं।

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