मुंबई. वस्त्रोद्योग और अन्य उद्योगों से निकलने वाले चमकीले रंगों (डाई) के कारण होने वाले जल प्रदूषण पर अब विज्ञान ने प्रभावी लगाम लगाने का रास्ता ढूंढ लिया है. आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है, जिससे अब ‘रंग’ पानी को खराब नहीं करेंगे. इस नई प्रणाली में ‘जैव-नैनो सिस्टम’ का कमाल देखने को मिला है, जो जल उपचार के पुराने तरीकों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है. यह खोज भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकती है.
मैंग्रोव जीवाणु और नैनोशीट का अद्भुत संगम
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत मैंग्रोव से प्राप्त समुद्री जीवाणुओं का उपयोग है. आईआईटी मुंबई की प्राध्यापिका शोभा शुक्ला के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने इन जीवाणुओं को ग्राफीन ऑक्साइड नैनोशीट पर संलग्न किया है. ग्राफीन ऑक्साइड अपनी विशेष संरचना के कारण रंजक अणुओं को तेजी से अपनी सतह पर खींच लेता है, जबकि उस पर मौजूद जीवाणु इन जटिल रसायनों को तुरंत तोड़कर कम हानिकारक यौगिकों में बदल देते हैं. यह प्रणाली न केवल रंगों को पानी से अलग करती है, बल्कि उनका पूर्ण विघटन भी सुनिश्चित करती है.
95 प्रतिशत तक शुद्धिकरण के बेहतर परिणाम
परीक्षणों के दौरान इस तकनीक ने प्रभावशाली परिणाम दिखाए हैं. वैज्ञानिकों ने एज्योर ए और एज्योर बी जैसे जटिल रंजकों पर इसका प्रयोग किया, जिसमें महज 24 घंटों के भीतर 95 प्रतिशत तक रंजकों का निष्कासन दर्ज किया गया. पारंपरिक तकनीकों में रंजक पूरी तरह खत्म नहीं होते थे और बाद में फिर से प्रदूषण फैलाते थे, लेकिन यह नई जैव-नैनो प्रणाली प्रदूषण को जड़ से समाप्त करने का काम करती है. शोध में पाया गया कि नैनोशीट की संतुलित सांद्रता पर जीवाणु अधिक सक्रिय रहते हैं और बेहतर तरीके से काम करते हैं.
भविष्य की राह और औद्योगिक उपयोग
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक जल उपचार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी. हालांकि बड़े स्तर पर इसके उपयोग के लिए लागत और संरचना से जुड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन वैज्ञानिक अब स्पंज जैसे पदार्थों को विकसित करने पर काम कर रहे हैं. इससे भविष्य में उद्योगों से निकलने वाले भारी मात्रा में अपशिष्ट जल को आसानी से साफ किया जा सकेगा. यह खोज न केवल हमारे जल स्रोतों को बचाएगी, बल्कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण सुरक्षा के बीच एक बेहतर संतुलन भी स्थापित करेगी.
हम केवल रंजक को हटा नहीं रहे हैं या केवल उसे शोष नहीं रहे हैं. हम रंजक को उसके सरलतम और अहानिकारक रूपों में विघटित कर रहे हैं.
- प्रा. शोभा शुक्ला, प्राध्यापिका आईआईटी मुंबई

शोधकर्ताओं का विश्वास है कि उनकी संकल्पना में वास्तविक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों में कार्य करने की क्षमता है, यद्यपि कुछ व्यावहारिक चुनौतियां अभी भी शेष हैं. मेरा मानना है कि हमारा दृष्टिकोण बड़े स्तर पर लागू करने योग्य है, किंतु वर्तमान उपचार तकनीकों की तुलना में इस प्रणाली का परिरक्षण थोड़ा महंगा हो सकता है. यह पद्धति वह समाधान प्रदान करती है, जिसका वर्तमान विधियों में प्रायः अभाव होता है. प्रदूषकों को जकड़ने के बाद उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित करने के स्थान पर इस पद्धति का उद्देश्य उन्हें पूर्णतः विघटित करना है.
– डॉ. नेहा रेडकर, अध्ययन की प्रथम लेखिका

