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सचिन अहीर का शिंदे सेना में पक्ष प्रवेश : चर्चा में आया ‘नीलम गोर्हे पैटर्न’

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पात्र-अपात्र को लेकर छिड़ी बहस
मुंबई : शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) के विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में ‘नीलम गोर्हे पैटर्न’ की चर्चा तेज हो गई है। शिंदे खेमे का दावा है कि अहीर ने किसी दूसरे दल में नहीं बल्कि उसी शिवसेना में प्रवेश किया है, जबकि ठाकरे गुट इसे दल-बदल का मामला बताते हुए उनकी पात्रता और अपात्रता को लेकर कानूनी लड़ाई की तैयारी में जुट गया है।
क्या है ‘नीलम गोर्हे पैटर्न’?
सचिन अहीर को शिंदे खेमे में शामिल कराने के पीछे राजनीतिक गलियारों में ‘नीलम गोर्हे पैटर्न’ की चर्चा हो रही है। नीलम गोर्हे संयुक्त शिवसेना के टिकट पर विधान परिषद पहुंची थीं। 2023 में शिंदे गुट में जाने के बावजूद वह विधान परिषद की उपसभापति बनी रहीं। अब शिंदे, संयुक्त शिवसेना के दौर में विधान परिषद पहुंचे सचिन अहीर को अपने साथ लेकर गोर्हे वाली रणनीति को दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। महायुति ने उन्हें उपसभापति पद का उम्मीदवार भी बनाया है।
शिंदे का दावा, ‘शिवसेना में ही हैं अहीर’
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि सचिन अहीर धनुष-बाण चुनाव चिन्ह पर संयुक्त शिवसेना के उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद पहुंचे थे। वर्तमान में शिवसेना और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह उनके नेतृत्व वाले दल के पास है, इसलिए अहीर ने किसी दूसरे दल में प्रवेश नहीं किया बल्कि शिवसेना में हैं। उन्होंने अपने इस फैसले को “फूलप्रूफ” बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह कानूनी आधार पर लिया गया है।
ठाकरे गुट की कानूनी तैयारी
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे गुट इस कदम को दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में मानते हुए कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। पार्टी की ओर से विधान परिषद के सभापति को पत्र सौंपने और संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अहीर की सदस्यता समाप्त करने की मांग किए जाने की चर्चा है। इस संबंध में कानूनी सलाह भी ली जा रही है।
अरविंद सावंत ने उठाए संवैधानिक सवाल
ठाकरे गुट के सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार कोई सदस्य अकेले दल नहीं बदल सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अहीर शिवसेना यूबीटी के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए थे तो उनकी सदस्यता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सावंत ने पूरे मामले की वैधानिक जांच की मांग करते हुए इसे संविधान की कसौटी पर परखने की आवश्यकता बताई।

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