जस्टिस जॉयमाला बागची के सवाल पर नीरज कौल ने कहा- इससे अयोग्यता तय नहीं होती
मुंबई . शिवसेना (ShivSena) के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में चल रही सुनवाई के दौरान मंगलवार को जस्टिस जॉयमाला बागची (Justice Joymala Bagchi) ने अहम सवाल उठाया कि यदि चुनाव चिन्ह का फैसला एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) गुट के खिलाफ जाता है तो स्थिति क्या होगी. शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल (Neeraj Kishan Kaul) ने जवाब दिया कि केवल चुनाव चिन्ह का फैसला किसी गुट के विधायकों को अयोग्य नहीं बनाता. चिन्ह उस गुट को मिल सकता है जो खुद को वास्तविक राजनीतिक दल साबित कर सके. इसी दौरान कौल ने कहा कि राजनीतिक दल की पहचान केवल विधानसभा में संख्या बल से तय नहीं की जा सकती.
पक्ष की पहचान केवल विधायकों की संख्या से नहीं
कौल ने दलील दी कि दो गुट बनने के बाद यह तय करना जरूरी है कि मूल राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व कौन करता है. इसके लिए पार्टी के संविधान, नेतृत्व की संरचना और संगठनात्मक व्यवस्था को देखा जाना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल संख्या बल का खेल नहीं है. विधानसभा के बाहर राजनीतिक दल का संगठन और नेतृत्व भी महत्वपूर्ण है.
व्हिप का अधिकार और विधायकों का पार्टी से संबंध
कौल ने व्हिप जारी करने के अधिकार पर भी दलील दी कि इसे केवल विधायी दल तक सीमित मानना उचित नहीं होगा. विधायक चुनाव लड़ते समय पार्टी के नाम, विचारधारा और वादों के आधार पर मत मांगते हैं. इसलिए निर्वाचित होने के बाद उनका राजनीतिक दल से संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) का उद्देश्य इसी तरह के दल-बदल को रोकना है.
जस्टिस बागची ने सादिक अली मामले का संदर्भ दिया
जस्टिस बागची ने सादिक अली मामला (Sadiq Ali case) का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि यदि कुछ सदस्य संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर अयोग्य घोषित होते हैं, तो चुनाव चिन्ह से जुड़े सिद्धांत किस पर लागू होंगे. उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों गुट खुद को वास्तविक राजनीतिक दल साबित नहीं कर पाते तो स्थिति और जटिल हो सकती है, क्योंकि जमीनी स्तर के पार्टी सदस्यों की संख्या तय करना आसान नहीं है.
ठाकरे के इस्तीफे का भी मुद्दा उठा
कौल ने दलील दी कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) बहुमत परीक्षण का सामना करने से पहले ही इस्तीफा दे चुके थे. इसलिए तत्कालीन राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) को एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना पड़ा. इसी संदर्भ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत (Justice Surya Kant), जस्टिस जॉयमाला बागची (Justice Joymala Bagchi) और जस्टिस मोहना (Justice Mohana) के बीच भी चर्चा हुई.
चुनाव आयोग के अधिकारों का बचाव
कौल ने संविधान के अनुच्छेद 324 (Article 324) और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (Association for Democratic Reforms) मामले का हवाला देते हुए भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के व्यापक संवैधानिक अधिकारों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि पार्टी की पहचान और चुनाव चिन्ह पर फैसला करते समय आयोग ने अपने अधिकारों का संवैधानिक दायरे में इस्तेमाल किया.
शिंदे गुट ने आयोग के फैसले को सही बताया
शिवसेना (Shiv Sena) के मुख्य सह प्रवक्ता डॉ. राजू वाघमारे (Dr. Raju Waghmare) ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट की दलीलें मजबूत साबित हुई हैं. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने पार्टी की संरचना और उपलब्ध बहुमत के आधार पर शिवसेना तथा ‘धनुष-बाण’ चिन्ह शिंदे गुट को दिया था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 2018 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में पार्टी के संविधान में बदलाव किए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम, चुनाव चिन्ह, विधायकों की अयोग्यता और व्हिप के अधिकार से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई बुधवार और गुरुवार को भी जारी रहेगी.
‘चिन्ह का फैसला शिंदे के खिलाफ गया तो क्या होगा?’
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