होर्मुज संकट में फंसी भारत की गैस सप्लाई
मुंबई: मध्यपूर्व में ईरान-इजरायल संघर्ष का असर अब सीधे भारत की रसोई तक पहुंचने लगा है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे भारत की एलपीजी आयात व्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है।
भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 60% एलपीजी आयात करता है, जिसमें से 90% सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है। लेकिन युद्ध के कारण यह अहम समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गया है और कतर से आने वाली करीब 60% गैस सप्लाई ठप पड़ने की आशंका है।
होर्मुज का विकल्प तलाशना सबसे बड़ी चुनौती
भारत के सामने सिर्फ नए सप्लायर ढूंढना ही नहीं, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य का विकल्प खोजना भी बड़ी चुनौती है। खाड़ी देशों से आने वाला ज्यादातर गैस इसी संकरे मार्ग से गुजरता है।
रूस के संकेतों से वैश्विक संकट बढ़ने की आशंका
भारत पहले से ही होर्मुज संकट के कारण सप्लाई बाधित होने का सामना कर रहा है। इसी बीच रूस ने भी संकेत दिए हैं कि यदि घरेलू कीमतें बढ़ती हैं तो वह तेल निर्यात पर रोक लगा सकता है। ऐसा फैसला पहले भी लिया जा चुका है। रूस के निर्यात रोकने पर कच्चे तेल और गैस दोनों की उपलब्धता प्रभावित होगी। इससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
आम आदमी की रसोई पर बढ़ा बोझ
सप्लाई कम होने से वैश्विक कीमतों में और उछाल आ सकता है। भारत के घरेलू बाजार पर पड़ेगा और पेट्रोल, डीजल के साथ-साथ एलपीजी सिलेंडर के दाम भी बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार ने फिलहाल 10 लाख टन गैस की व्यवस्था कर राहत दी है, लेकिन लंबी अवधि का संकट अभी टला नहीं है।
सरकार का ‘प्लान-बी’ सक्रिय
संभावित संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने तेजी से वैकल्पिक इंतजाम शुरू कर दिए हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, कतर के अलावा अन्य देशों से गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं।
वैकल्पिक देशों से संपर्क
भारत ने अमेरिका से 22 लाख टन एलपीजी खरीद का समझौता किया है। इसके अलावा कनाडा, नॉर्वे, रूस, ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना जैसे देशों से भी आयात की तैयारी चल रही है। अब तक 20 बड़े एलपीजी टैंकर मंगाए जा चुके हैं, जिनमें करीब 10 लाख टन गैस है। इनमें अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। यह स्टॉक फिलहाल देश की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम माना जा रहा है।
महंगा पड़ रहा वैकल्पिक ईंधन
कतर से गैस आयात भौगोलिक रूप से सस्ता पड़ता है, लेकिन अब दूरस्थ देशों से आयात महंगा साबित हो रहा है।
अमेरिका/कनाडा से गैस 15% से 30% तक महंगी पड़ रही है।
हो रहा है प्रति टन 80 से 150 डॉलर अतिरिक्त खर्च।
कतर से आयात लागत करीब 600 डॉलर/टन, जबकि अमेरिका से यह 700 डॉलर से अधिक।
लंबी दूरी के कारण सप्लाई में देरी भी होगी, जिससे आपूर्ति तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
आयात महंगा होने से तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा और इसका असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। इसलिए यदि लंबे समय तक हालात ऐसे ही बने रहे, तो रसोई गैस के दाम बढ़ना लगभग तय है। ऐसे में मध्यम वर्ग को अभी से ईंधन बचत और बजट संतुलन की तैयारी करनी होगी।
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