मुंबई. साल 2026 में होली एक दुर्लभ खगोलीय संयोग के बीच आ रही है। फाल्गुन पूर्णिमा पर पूर्ण चंद्रग्रहण, भद्रा और सूतक काल—तीनों का प्रभाव एक साथ पड़ रहा है। इसी कारण होलिका दहन की तारीख को लेकर ज्योतिषाचार्यों में मतभेद सामने आए हैं।
पूर्णिमा, भद्रा और ग्रहण का भ्रम
पूर्णिमा तिथि: 2 मार्च शाम 5:55 से 3 मार्च शाम 5:07 बजे तक
भद्रा काल: 2 मार्च शाम 5:58 से 3 मार्च सुबह 5:28 बजे तक
भद्रा पुच्छ: 2 मार्च रात 1:25 से 2:35 बजे
बजे
पूर्ण चंद्रग्रहण: 3 मार्च दोपहर 3:20 से शाम 6:47 बजे तक
सूतक काल: 3 मार्च सुबह लगभग 6:20 बजे से शाम 6:47 बजे तक
इन्हीं गणनाओं के कारण यह सवाल उठा कि होलिका दहन 2 मार्च को करें या 3 मार्च को?
2 मार्च को दहन का पक्ष क्या कहता है?
कुछ विद्वानों के अनुसार, पूर्णिमा तिथि में ही होलिका दहन होना चाहिए। भद्रा पुच्छ (रात 1:25–2:35) में दहन का विकल्प मौजूद है।
लेकिन समस्या यह है कि इस बार भद्रा का वास धरती लोक में माना जा रहा है, जिसे शास्त्रों में अशुभ बताया गया है। साथ ही अगले दिन ग्रहण भी है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।
3 मार्च को दहन क्यों अधिक शास्त्रसम्मत
अधिकांश ज्योतिषाचार्यों की राय में 2 मार्च को भद्रा का प्रभाव बना रहता है। 3 मार्च को दिन में ग्रहण और सूतक के कारण दहन संभव नहीं हैवलेकिन 3 मार्च शाम 6:47 बजे ग्रहण व सूतक समाप्त होने के बाद न भद्रा रहती है, न सूतक का दोष और प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा भी मान्य रहती है, ऐसे में ज्योतिषाचार्य ऐसे में दूसरे दिन भद्रा-मुक्त समय को प्राथमिकता देने का समर्थन करते हैं।

निष्कर्ष: होलिका दहन की सही तिथि
2 मार्च: पूर्णिमा है, पर भद्रा का धरती लोक में वास—जोखिम भरा
3 मार्च: ग्रहण के बाद का समय पूरी तरह भद्रा-मुक्त और सूतक-मुक्त
अतः 3 मार्च 2026 को शाम 6:47 बजे के बाद होलिका दहन करना सबसे सुरक्षित और शास्त्रसम्मत माना जा रहा है।
रंगोंतस्व (धुलेंडी) कब मनाएं?
होलिका दहन 3 मार्च की रात के बाद रंगोत्सव 4 मार्च 2026 (बुधवार) को मनाना अधिक उपयुक्त रहेगा
यह विकल्प धार्मिक दृष्टि से भी शुद्ध है और ग्रहण-दोष से भी मुक्त।
ग्रहण का प्रभाव: किन राशियों को विशेष सावधानी
यह खग्रास चंद्रग्रहण मघा नक्षत्र और सिंह राशि में लगेगा।
मघा नक्षत्र और सिंह राशि वालों को ग्रहण देखने से बचने की सलाह
गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सावधानी आवश्यक
होलिका दहन पर शुभ-अशुभ योग
शुभ योग
ग्रहण के बाद दहन: दोष-मुक्त
प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा
अग्नि तत्व की शुद्धि से नकारात्मकता का नाश
अशुभ योग : भद्रा में दहन
सूतक काल में कोई भी मांगलिक कार्य
परंपरा, सावधानी और उत्सव का संतुलन
होलिका दहन सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है।
इस वर्ष थोड़ी प्रतीक्षा और सही मुहूर्त का चयन आपको धार्मिक शांति, मानसिक संतुलन और शुभ फल—तीनों प्रदान करेगा।

डिस्क्लेमर:
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग गणनाओं और ज्योतिषीय मतों पर आधारित है। तह की बात इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता और किसी भी तरह से अंधविश्वास का हम बिल्कुल भी समर्थन नहीं करता अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार निर्णय भिन्न हो सकता है। किसी भी धार्मिक कार्य से पहले अपने स्थानीय आचार्य या पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

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