‘हिंद-दी-चादर’ गुरु तेग बहादुर के 350वें शहीदी दिवस पर नवी मुंबई में भव्य समागम
नवी मुंबई. खारघर में कविवार को गुरु श्री तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर ‘हिंद-दी-चादर शहीदी समागम’ का भव्य और ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की गरिमामय उपस्थिति में इस समारोह ने एक राष्ट्रीय चेतना का रूप ले लिया। सिख, सिकलीगर, बंजारा, लबाना, सिंधी, मोहयाल, वाल्मीकी और उदासी-नानकपंथी सहित आठ प्रमुख समाजों के हजारों श्रद्धालुओं ने गुरु साहिब और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष शीश नवाया। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर नौवें गुरु तेग बहादुर जी हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शहादत न देते, तो आज पूरे विश्व में एक भी हिंदू नहीं बचता। उन्होंने कहा, “1675 में औरंगजेब के शासनकाल में गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान न केवल देश की जनता की हिम्मत बढ़ाने वाला था, बल्कि इसने औरंगजेब के अत्याचार करने की शक्ति को भी तोड़ दिया।”
शाह ने बताया कि जब कश्मीरी पंडितों पर मुगल आक्रांताओं का अत्याचार बढ़ा और जबरन धर्म परिवर्तन का संकट आया, तब वे गुरु साहिब की शरण में पहुंचे। गुरु जी ने बिना एक पल की देरी किए उनकी रक्षा का संकल्प लिया और अपना शीश न्यौछावर कर दिया। उन्होंने दसों गुरुओं के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि गुरु नानकदेव जी ने ‘नाम जपो, कीरत करो और वंड छको’ का मंत्र दिया, गुरु अंगददेव जी ने शिक्षा का प्रसार किया, गुरु अमरदास जी ने सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया और गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर अत्याचार के विरुद्ध बड़ी लड़ाई का सूत्रपात किया। शाह ने कहा, “‘सरबंसदानी’ गुरु गोबिंद सिंह जी जैसा पराक्रमी योद्धा इतिहास में दूसरा कोई नहीं हुआ।” उन्होंने सभी देशवासियों से आह्वान किया कि दसों गुरुओं के जीवन से प्रेरणा लेकर धर्म परिवर्तन के विरुद्ध एकजुट हों।
“गुरु साहिब के बलिदान से ही आज आस्था की रक्षा हो सकी”
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “श्री गुरु तेग बहादुर साहिब के महान बलिदान के कारण ही हम आज अपनी आस्था की रक्षा कर पाए हैं।” उन्होंने एक प्रेरणादायक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब औरंगजेब ने गुरु साहिब के पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार पर प्रतिबंध लगाया, तब लक्खी शाह बंजारा जी उनके पार्थिव शरीर को अपने घर ले गए और घर समेत अग्नि को समर्पित कर दिया। फडणवीस ने कहा, “गुरु साहिब के इस बलिदान ने देश में ऐसी क्रांति जगाई कि औरंगजेब कभी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।” उन्होंने यह भी बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने गुरु तेग बहादुर साहिब की शौर्यगाथा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
“सेना नहीं थी, पर साहस और सत्य था”
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने गुरु साहिब को नमन करते हुए कहा, “धर्म के लिए शीश दिया, पर सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। यही आदर्श आज के भारत को दिशा देता है।” उन्होंने कहा कि 17वीं शताब्दी में जब कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्म परिवर्तन का संकट आया, तब गुरु तेग बहादुर ने दिल्ली के चांदनी चौक में शीश कटवाना स्वीकार किया, लेकिन अन्याय के सामने नहीं झुके। शिंदे ने भावपूर्ण शब्दों में कहा, “उनके पास सेना नहीं थी, ताज नहीं था, खजाना नहीं था. लेकिन असीम साहस, अटल सत्य और अपार करुणा थी. इसीलिए उन्हें ‘हिंद-दी-चादर’ कहा जाता है।” शिंदे ने बताया कि गुरुजी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सरकार 6000 से अधिक गांवों में डिजिटल रथों के माध्यम से जनजागृति अभियान चला रही है। उन्होंने महाराष्ट्र और पंजाब के ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करते हुए याद दिलाया कि 1984 के सिख-विरोधी दंगों के दौरान शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने मुंबई में सिख समाज की रक्षा के लिए शिवसैनिकों को सड़क पर उतारा था।
तीन शहरों में हुआ राष्ट्रीय आयोजन
यह शहीदी समागम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर राष्ट्रीय स्तर पर नागपुर, नांदेड और नवी मुंबई (तीन शहरों) में आयोजित किया गया। समारोह में उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा अजित पवार, मंत्री मंगलप्रभात लोढा, गिरीष महाजन, आशिष शेलार, गणेश नाईक, संजय राठोड, राज्यमंत्री माधुरी मिसाल तथा सिख धर्मगुरु बाबा हरनाम सिंह खालसा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। गुरु ग्रंथ साहिब में संत नामदेव, कबीर और संत रविदास जैसे महान संतों के पदों का समावेश भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता का जीवंत प्रमाण है। यह संदेश इस समागम की आत्मा बना रहा।
