मुंबई : अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध की लपटें अब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहीं। इसकी तपिश पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक बनता जा रहा है। गैस और कच्चे तेल की भारी किल्लत के बाद अब एक और बड़ा संकट भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है — और वो है भारतीय रुपए की बेतहाशा गिरावट। इस संकट से देश का खजाना तेजी से खाली होने का खतरा मंडरा रहा है।
र93.49 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा रुपया
शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया 60 पैसे की गिरावट के साथ डॉलर के मुकाबले 93.49 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर जा पहुंचा। बाजार खुलते वक्त रुपया 92.92 पर था, लेकिन देखते ही देखते यह 93 के पार चला गया। इससे पहले 20 मार्च को पहली बार रुपए ने 93 का स्तर तोड़ा था, जबकि 18 मार्च को यह 92.63 तक गिरा था। बुधवार को रुपया 92.89 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था।
रुपए के गिरने के हैं ये 5 बड़े कारण
1-कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें : मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। शुक्रवार को ये कुछ गिरकर 107 डॉलर पर आईं, लेकिन अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। महंगे तेल से भारत का आयात बिल बढ़ता है, डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया दबाव में आ जाता है।
2 -डॉलर की बढ़ती मांग : ज्यादा आयात बिल चुकाने के लिए कंपनियां भारी मात्रा में डॉलर खरीद रही हैं, जिससे रुपए पर दबाव और बढ़ रहा है।
3 -विदेशी निवेशकों की निकासी : मार्च महिने में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 8 अरब डॉलर से भी ज्यादा रकम निकाल ली। जनवरी 2025 के बाद यह सबसे बड़ी पूंजी की वापसी है।
4 -अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना : वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक डॉलर को सुरक्षित ठिकाना मान रहे हैं। छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर इंडेक्स 0.17% बढ़कर 99.40 पर पहुंच गया है।
5 -रुपए का अवमूल्यन और उसके दूरगामी असर : रुपए की कमजोरी सिर्फ सरकारी खजाने पर नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी सीधा वार करती है। महंगाई बढ़ती है, मासिक बजट बिगड़ता है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 75 से 80 फीसदी विदेश से आयात करता है। अनुमान है कि डॉलर के मुकाबले रुपए में सिर्फ 1 रुपए की गिरावट से तेल कंपनियों पर करीब 8,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 10 फीसदी की बढ़ोतरी से महंगाई करीब 0.8 फीसदी तक उछल सकती है, जिसका सीधा असर खाने-पीने और आवागमन के खर्च पर पड़ेगा।
दवाएं, पढ़ाई और रोज़मर्रा की जिंदगी होगी महंगी
रुपए की कमजोरी का असर जिंदगी के हर पहलू पर पड़ेगा। भारत में कई जरूरी दवाएं आयात होती हैं, जो अब महंगी हो जाएंगी। विदेश में पढ़ाई करना और ज्यादा भारी पड़ेगा। विदेश यात्रा का खर्च बढ़ेगा और होटल व खान-पान पर भी ज्यादा रकम खर्च करनी होगी।
विकास योजनाओं पर भी पड़ेगी गाज
सरकार तेल कंपनियों को सब्सिडी देकर आम जनता को राहत देने की कोशिश करती है, लेकिन जैसे-जैसे डॉलर महंगा होता है, सरकारी खर्च बढ़ता जाता है। इसका खामियाजा सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी विकास योजनाओं को भुगतना पड़ सकता है। साथ ही, आयात ज्यादा होने से चालू खाता घाटा (CAD) भी बढ़ता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए और खतरनाक संकेत है।
RBI की कोशिशें, पर राहत कितनी?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मार्च में अब तक 15 अरब डॉलर से ज्यादा बेचकर रुपए को थामने की कोशिश की है। वित्त वर्ष के अंत में RBI का हस्तक्षेप आमतौर पर बढ़ जाता है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जब तक तेल की कीमतें ऊंची रहेंगी और विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहेगी, रुपया दबाव में ही रहेगा। फिलहाल RBI का हस्तक्षेप ही एकमात्र बड़ा सहारा नजर आता है।

रुपए का सफर: साल दर साल नीचे की ओर

वर्षरुपया (प्रति डॉलर, मार्च अंत)
201764.85
201865.11
201969.18
202075.33
202173.13
202275.90
202382.15
202483.35
202585.45

सिर्फ भारत नहीं, पूरा एशिया हांफ रहा है
यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। डॉलर के मुकाबले एशियाई मुद्राओं में भी भारी गिरावट आई है — दक्षिण कोरियाई वॉन 3.69%, फिलीपीन पेसो 4.05% और थाई बात 5.20% तक लुढ़क चुके हैं। भारतीय रुपए में 1.79% की गिरावट तुलनात्मक रूप से कम है, लेकिन देश की विशाल आयात निर्भरता को देखते हुए यह आंकड़ा भी किसी खतरे की घंटी से कम नहीं। गैस और तेल संकट के बाद अब रुपए की यह गिरावट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है। अगर हालात जल्द नहीं संभले, तो इसकी कीमत आम आदमी की जेब से ही चुकानी पड़ेगी।

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