शिवसेना नाम-चुनाव चिन्ह विवाद में ठाकरे गुट का सुको में दावा
मुंबई : शिवसेना के नाम, चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ (Shiv Sena name, election symbol ‘bow and arrow’) और 2022 की बगावत से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में हुई अहम सुनवाई के दौरान ठाकरे गुट (Uddhav Thackeray’s party) ने दावा किया कि यदि अयोग्यता याचिकाओं पर समय रहते फैसला हो गया होता तो एकनाथ शिंदे (Ekanath Shinde) सरकार का गठन ही नहीं हो पाता। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Kapil Sibbal) ने अदालत में कहा कि किसी दल के चुनाव चिन्ह पर जीतकर बाद में उसी पार्टी के खिलाफ दावा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है। (Kapil sibbal blamed supreme court : Had the decision been taken on time, the Shinde government would not have been formed)
शिंदे की नियुक्ति उद्धव ठाकरे ने की थी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन (Chief Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi and Justice V. Mohan) की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की थी और 2018 में पार्टी के विधिवत संगठनात्मक चुनाव हुए थे। उन्होंने कहा कि उसी वर्ष एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता स्वयं उद्धव ठाकरे ने नियुक्त किया था। ऐसे में बाद में उसी पद के आधार पर मूल पार्टी पर दावा करना उचित नहीं है।
दल-बदल कानून पर रखा पक्ष
सिब्बल ने कहा कि विधान परिषद चुनाव के बाद कई विधायक पहले सूरत और फिर गुवाहाटी गए तथा अधिकृत प्रतोद को हटाकर अलग राजनीतिक रुख अपनाया। उन्होंने दलील दी कि दल-बदल कानून स्पष्ट है और किसी भी विधायक का स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना अयोग्यता का आधार बनता है। उन्होंने कहा कि समय पर सुनवाई और निर्णय होता तो शिंदे सरकार का गठन नहीं होता।
चुनाव आयोग के फैसले पर भी सवाल
ठाकरे गुट ने फरवरी 2023 में चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को शिवसेना नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह दिए जाने के फैसले पर भी सवाल उठाए। सिब्बल ने कहा कि राजनीतिक दल और विधायक दल अलग-अलग संस्थाएं हैं। केवल विधायकों की संख्या के आधार पर किसी गुट को मूल राजनीतिक दल नहीं माना जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने 2018 के संशोधित पार्टी संविधान की अनदेखी की।
अगली सुनवाई 4 अगस्त को
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त तय की है। अब राज्य की राजनीति और दोनों शिवसेना गुटों की निगाहें इस तारीख पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।

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