मुंबई: किसी पुरुष के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध, बार-बार साथ रहना (सहवास) और उससे संतान का जन्म होना—इन परिस्थितियों को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” के रूप में माना जा सकता है। यह अहम टिप्पणी बॉम्बे हाईकोर्ट ने की है।
न्यायमूर्ति एम. एम. नेरलिकर की पीठ ने इन टिप्पणियों के साथ संबंधित महिला द्वारा दायर मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया।
भरण-पोषण आदेश रद्द कराने हाईकोर्ट पहुंचा आरोपी
इस मामले में निचली अदालत ने आरोपी को महिला और उसकी नाबालिग बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। आरोपी और उसके परिवार ने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित कार्यवाही और वर्ष 2022–23 में दिए गए भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के आदेश को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
पीड़िता का दावा: लंबे समय का रिश्ता और बेटी का जन्म
पीड़ित महिला के अनुसार, उसका आरोपी के साथ लंबे समय तक प्रेम संबंध था। इस दौरान वह गर्भवती हुई, लेकिन आरोपी के दबाव में उसे गर्भपात कराना पड़ा। इसके बाद भी दोनों के संबंध जारी रहे और बाद में महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया। फिलहाल बच्ची आठ महीने की है। वर्ष 2022 में आरोपी ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इसके बाद पीड़िता की शिकायत पर आरोपी के खिलाफ बलात्कार और एट्रोसिटी एक्ट के तहत मामले दर्ज किए गए।
“वन नाइट स्टैंड” को पारिवारिक रिश्ता नहीं कहा जा सकता
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि केवल सप्ताहांत में साथ रहना या “वन नाइट स्टैंड” को पारिवारिक या वैवाहिक संबंध नहीं माना जा सकता। वकील ने यह भी दावा किया कि यह मामला बदले की भावना से दर्ज किया गया है और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए।
पीड़िता की ओर से तर्क
पीड़िता के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि घरेलू हिंसा अधिनियम की व्याख्या का विस्तार किया जाना आवश्यक है, ताकि ऐसे हालात में पीड़ित महिलाओं को कानूनी संरक्षण मिल सके।
कोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति एम. एम. नेरलिकर ने स्पष्ट किया कि महिला और पुरुष द्वारा साथ बिताया गया समय उनके बीच शारीरिक संबंधों की प्रकृति और संतान का जन्म, ये सभी बातें “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” के मजबूत संकेत हैं। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सहवास, शारीरिक संबंध और बच्चे का जन्म, प्रथम दृष्टया घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(एफ) के तहत आते हैं। हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि आरोपी द्वारा बाद में किया गया विवाह, महिला को प्रारंभिक स्तर पर कानूनी संरक्षण से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। दोनों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे हैं और उनसे एक बच्ची का जन्म हुआ है। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस स्तर पर मामले को रद्द करना उचित नहीं होगा।
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