मुंबई : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत (Dr. Mohan Bhagwat) ने कहा कि किसी भी समस्या का स्थायी समाधान संवाद के माध्यम से ही संभव है। यदि समाधान नहीं निकलता तो संवैधानिक तरीके से आंदोलन किया जा सकता है, लेकिन आंदोलन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे समाज में विभाजन पैदा हो। उन्होंने युवाओं से सकारात्मक सोच, विवेकपूर्ण आचरण और राष्ट्रहित को सर्वोच्च रखने का आह्वान किया।
मुंबई स्थित नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र (Nita Mukesh Ambani Cultural Centre) में इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (India’s International Movement to Unite Nations-I.I.M.U.N.) के 15वें स्थापना दिवस पर आयोजित वार्षिक चैंपियनशिप कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. भागवत ने यह विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में देश के 100 से अधिक शहरों से आए 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के 2,000 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। संस्था के संस्थापक ऋषभ शाह (Rishabh Shah) ने उनका स्वागत करते हुए छात्रों की जिज्ञासाएं उनके समक्ष रखीं।
जेन-जी को राष्ट्रविरोधी मानना गलत
डॉ. भागवत ने कहा कि आज की जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी अधिक प्रामाणिक है। युवाओं के सवालों और आंदोलनों को केवल विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उनकी समस्याओं को समझकर समाधान निकालना समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी राष्ट्रविरोधी नहीं है, बल्कि उसके साथ आत्मीय संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है।
शिक्षा समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी
शिक्षा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी समान भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने का समर्थन किया और विद्या भारती (Vidya Bharati) द्वारा बिना सरकारी आर्थिक सहायता के हजारों विद्यालय संचालित किए जाने की सराहना की।
सोशल मीडिया का जिम्मेदारी से करें उपयोग
डॉ. भागवत ने युवाओं से सोशल मीडिया पर केवल विश्वसनीय और समाजहित की जानकारी साझा करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सही और गलत की पहचान करने की विवेकशीलता विकसित करना आवश्यक है तथा वरिष्ठ पीढ़ी को भी इस दिशा में युवाओं का मार्गदर्शन करना चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर सरकार के साथ खड़े रहें
उन्होंने कहा कि भारत संवाद और सद्भाव के माध्यम से स्थायी समाधान में विश्वास रखता है। हालांकि संघर्ष की स्थिति में प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अपनी सरकार के साथ खड़ा रहे। उन्होंने कहा कि समाज की प्रगति आपसी समन्वय, संवाद और एक-दूसरे को समझने से होती है।
एलजीबीटी समुदाय को सम्मान मिले
एलजीबीटी (LGBT) समुदाय पर बोलते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि वे भी समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह का उद्देश्य केवल साथ रहना नहीं, बल्कि सुसंस्कारित समाज का निर्माण भी है। उनके अनुसार समलैंगिक संबंधों को पारंपरिक विवाह के बजाय सहचर्य (कंपैनियनशिप) के रूप में देखा जा सकता है।
महिलाओं की भागीदारी पर दिया जोर
संघ में महिलाओं की भूमिका को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि संघ की विभिन्न संस्थाओं में महिलाओं को समान जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। राष्ट्र सेविका समिति (Rashtra Sevika Samiti) की स्थापना भी संघ के शुरुआती दौर में ही हुई थी और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी है।
रोजगार का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं
उन्होंने कहा कि रोजगार को केवल नौकरी तक सीमित नहीं समझना चाहिए। उद्यमिता, कौशल विकास और श्रम का सम्मान भी रोजगार के महत्वपूर्ण आयाम हैं। समाज में श्रम प्रतिष्ठा की भावना को मजबूत करने और शिक्षा व्यवस्था में उसके अनुरूप बदलाव की आवश्यकता है।
आरक्षण पर राजनीति नहीं होनी चाहिए
आरक्षण के मुद्दे पर डॉ. भागवत ने कहा कि सामाजिक विषमता के कारण इसकी आवश्यकता पड़ी। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर (Dr. Babasaheb Ambedkar) की सोच का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के उपाय प्रभावी ढंग से लागू किए जाएं तो भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता स्वतः कम हो सकती है। इस विषय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
2047 के विकसित भारत के लिए नेतृत्व का मंत्र
पर्यावरण संरक्षण पर उन्होंने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर तथा दैनिक जीवन से होनी चाहिए। वहीं वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लिए उन्होंने कहा कि सच्चा नेतृत्व स्वयं से शुरू होता है। जो स्वयं सही दिशा में चलता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन कर सकता है। नेतृत्व का वास्तविक उद्देश्य केवल अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि नए नेता तैयार करना है।
राष्ट्रगान के साथ हुआ सम्मेलन का शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई। इसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की गईं तथा आई.आई.एम.यू.एन. (I.I.M.U.N.) के पूर्व विद्यार्थियों ने अपने अनुभव साझा किए। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के अनेक गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे।
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