मुंबई: महाराष्ट्र सरकार की त्रिभाषा नीति को लेकर बनाई गई विशेष समिति की रिपोर्ट ने भाजपा नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। डॉ. नरेंद्र जाधव समिति ने पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य करने के सरकार के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। यह रिपोर्ट अब मंगलवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में विचारार्थ रखी जाएगी, जिस पर सभी की नजर टिकी हुई है।
स्कूली नीति पर अड़चन
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा जिस तेजी से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना चाह रही थी, समिति की यह सिफारिश उस रास्ते में एक बाधा बन गई है। सरकार पहली कक्षा से मराठी और अंग्रेजी के साथ एक अन्य भाषा (जिसे हिंदी बनाने का इरादा था) अनिवार्य करने पर विचार कर रही थी। हालांकि, समिति ने स्पष्ट किया है कि राज्य में इस प्रस्ताव को व्यापक समर्थन नहीं मिला है।
‘2001 का ही फॉर्मूला लागू रखने का सुझाव’
डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि वर्तमान त्रिभाषा फॉर्मूले में ही कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। समिति के मुताबिक, राज्य में 2001 से जो व्यवस्था चली आ रही है, वही जारी रहनी चाहिए। यानी मराठी और अंग्रेजी अनिवार्य रहेंगी और हिंदी विषय पांचवीं कक्षा से ही पढ़ाया जाएगा। समिति का यह निष्कर्ष पिछले कुछ समय से चले आ रहे विवाद पर विराम लगा सकता है।
विरोध के बाद बनी थी समिति
गौरतलब है कि पहली कक्षा से हिंदी लागू करने के प्रस्ताव का शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और मराठी अभ्यासकों ने जमकर विरोध किया था। इसी विवाद के चलते सरकार को दो बार अपना आदेश वापस लेना पड़ा था और अंततः इस समिति का गठन किया गया था। अब समिति की रिपोर्ट के साथ यह मामला कैबिनेट की मेज पर है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में लिया गया निर्णय राज्य की शिक्षा नीति के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक रणनीति को भी प्रभावित करेगा।
क्या कहती है समिति की रिपोर्ट?
पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य करने का प्रस्ताव खारिज।
2001 के त्रिभाषा सूत्र को ही जारी रखने की सिफारिश।
मराठी और अंग्रेजी रहेंगी अनिवार्य, हिंदी पांचवीं से पढ़ाई जाएगी।
कहा गया कि प्रस्तावित बदलाव को लोगों का समर्थन नहीं मिला।
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