शिवप्रकाश (राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री,भाजपा )

भारत सरकार ने मंत्रिमंडलीय बैठक में एवं गृह मंत्रालय द्वारा पत्र निकालकर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ की 7 नवंबर 2025 से 1 वर्ष के लिए 150वीं जयंती मनाने का निर्णय किया है. इसी संकल्प को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अक्टूबर मास की अपनी ‘मन की बात’ में पुनः दोहराया था. ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ सहित समाज में चलने वाली अन्य संस्थाएं भी ‘वंदे मातरम’ की 150वीं जयंती मना रही है. देश भक्ति के साथ सांस्कृतिक महत्व को समाज तक ले जाने का यह प्रयास सराहनीय है.
23 जून 1757 को बंगाल में स्थित प्लासी के मैदान में हुए नवाब सिराजुद्दौला एवं लार्ड क्लाइव के मध्य हुए युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ मिली पराजय के कारण भारत की स्वतंत्रता सूर्य अस्त हो गया था. इस पराजय के पश्चात् भारत का शेष क्षेत्र भी ब्रिटिशों के अधीन आ गए और हम गुलाम हो गए. हमारी अवस्था का वर्णन करते हुए रूस के प्रसिद्ध दार्शनिक टॉलस्टॉय ने कहा कि “एक व्यापारी कंपनी ने अपने केवल 30 हजार लोगों को अंदर 20 करोड़ जनसंख्या वाले राष्ट्र को गुलाम बना लिया”
गुलामी के कालखंड में अपने देश की दुर्दशा देखकर समाज के मन में भारत मां को गुलामी से मुक्ति की आकांक्षा भी हिलोरे मारने लगी थी. समाज के अलग-अलग वर्गों में स्वतंत्रता का शंखनाद भी प्रारंभ हो गया था. मां काली के अनुयायी एवं गुरु गोरखनाथ की परंपरा से जुड़े संतों ने गांव-गांव “अलख निरंजन” का उद्घोष कर स्वतंत्रता देवी को जागृत किया. संथाल जनजाति में जन्में दोनों भाई सिद्धू-कानू ने 1885 में 10 हज़ार संथालियों के साथ “अपनी भूमि अपनाएंगे, अपनी सरकार बनाएंगे” का उद्घोष किया. अंग्रेज़ों के विरुद्ध 1857 का संगठित सशस्त्र आंदोलन का भी सूत्रपात हुआ.
समाज में प्रज्ज्वलित देश भक्ति के वातावरण में 27 जून 1938 को एक महापुरुष का जन्म हुआ, जिनको नाम मिला बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय. कुशाग्र बुद्धि, देवनागरी, बंगला, अंग्रेजी के विद्वान थे बंकिम बाबू.जेस्सोर (अब बांग्लादेश)में डिप्टी कलेक्टर नियुक्त हुए. अंग्रेजों के अत्याचार एवं यातनाओं को देखकर साहित्य के माध्यम से समाज जागृति लाने का संकल्प करते हुए उन्होंने अनेक लेखों, निबंधों एवं उपन्यासों की रचना की, जिसमें श्री कृष्ण चरित्र, दुर्गेश नंदिनी,राज सिंह, चंद्रशेखर जैसी कृतियां प्रसिद्ध है. उन्होंने  अपने समस्त लेखन से अंग्रेजी शासन की अन्यायकारी नीतियों को समाज के सम्मुख लाने का कार्य किया. इन्हीं उपन्यासों में से एक विश्व प्रसिद्ध ‘सन्यासी विद्रोह’ को आधार देकर एक कृति प्रसिद्ध हुई “आनंदमठ”. जिसमें राष्ट्रगीत वंदे मातरम की उपस्थिति हुई. आनंदमठ में वर्णित वंदे मातरम जिसका गायन भारत माता की स्तुति के स्वरूप में सन्यासी करते हैं, वह लालगोला केंद्रित मुर्शिदाबाद एवं नदियां (बंगाल) जिले में स्थित है.  
7 नवंबर 1875 को वंदे मातरम गीत की रचना हुई. यह शुभ दिन भारतीय काल गणना में कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की नवमी थी. यह शुभ दिवस अक्षय नवमी होने के कारण जगद्धात्री की पूजा का दिवस है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुवर रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा वंदे मातरम का गायन हुआ, जिसकी प्रस्तुति राग मल्हार में हुई. 1896 के बाद कांग्रेस के अधिवेशनों में वंदे मातरम गायन एक परंपरा बन गई.
बंगाल से उठने वाले स्वतंत्रता आंदोलन को विभाजित करने के लिए अंग्रेजों ने बंग-भंग की योजना का क्रियान्वयन किया. जिसकी घोषणा 16 अक्टूबर 1905 को उन्होंने की. बंगाल का प्रभाव कम करना, बंगाली क्रांतिकारियों का प्रभाव कम करना है एवं हिंदू-मुस्लिमों का विभाजन बंग-भंग का उद्देश्य था. विभाजन से पूर्व ही दूरदर्शी नेतृत्व ने 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में सभा का आयोजन किया. प्रत्येक आने वाला व्यक्ति एक ही उद्घोष कर रहा था वंदे मातरम. 16 अक्टूबर को आयोजित दुख-दिवस के अवसर पर आनंद मोहन बसु एवं सुरेंद्र नाथ बनर्जी के नेतृत्व में सेंट्रल मैदान कलकत्ता में 50,000 लोग वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए 3.5 किलोमीटर नग्न पाद चलकर आए. मन्मथ नाथ मिस्र के नेतृत्व में“वंदेमातरम् संप्रदाय” की रचना हो गई. अंग्रेजों की सजा के विरोध में एक युवक ने 500 बार वंदे मातरम लिखा. क्रांतिकारी कोड़े खाते थे और  वंदे मातरम बोलते थे, जिस कारण अंग्रेजों ने वंदेमातरम् उद्घोष पर ही प्रतिबंध लगा दिया. अब वंदेमातरम् संपूर्ण देश ही नहीं, स्वतंत्रता का संकल्प लेकर कार्य करने वाले विदेशस्थ क्रांतिकारियों का भी मंत्र बन गया. हजारों लोग 14 अप्रैल 1906 असम के बिहु उत्सव में छाती पर वंदे मातरम का बैच लगाकर आए. 22 दिसंबर 1908 को दशम गुरु गोविंद सिंह के जन्म दिवस पर लंदन स्थित इंडिया हाउस में वंदे मातरम का गायन हो गया. 22 अगस्त 1907 को स्टाट गार्ट में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में मैडम कामा ने वंदे मातरम का गायन किया. कनाडा- अमेरिका में स्थित क्रांतिकारी परस्पर मिलने पर अन्य संबोधन छोड़कर वंदे मातरम ही बोलने लगे. भगिनी निवेदिता द्वारा निर्मित ध्वज पर वंदेमातरम् अंकित हो गया. महर्षि अरविंद को ‘वंदे मातरम’ समाचार पत्र प्रकाशित करने की वजह से अंग्रेजों ने सजा दी. महाकवि सुब्रमण्यम द्वारा तमिल में ‘वंदे मातरम्’ का अनुवाद एवं महात्मा गांधी द्वारा गुजराती में तथा अन्य भाषा तेलुगु, कन्नड़, मलयालम एवं उर्दू में भी अनुवाद हुआ. संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने नागपुर के नील सिटी विद्यालय निरीक्षण के समय अंग्रेज इंस्पेक्टर का ‘वन्देमातरम्’ के साथ स्वागत किया. इस सभी के कारण ‘वंदे मातरम’ ने स्वतंत्रता के दीवानों के लिए मंत्र का रूप ले लिया.
स्वतंत्रता के साथ-साथ ‘वन्देमातरम्’ स्वदेशी का भी मंत्र बना. बंग-भंग  की घोषणा के दिन दुख-दिवस के आयोजन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने राखी बांधकर स्वदेशी का संकल्प कराया. उस दिन “विदेशी वस्तुओं का तिरस्कार एवं स्वदेशी का संकल्प” लिया. विदेशी वस्तुओं की होली जलाते समय “ॐ वंदेमातरम् राष्ट्राय स्वाहा”  के मंत्र का उच्चारण हुआ. एक ही दिन में स्वदेशी प्रचार के लिए 70,000 रुपए का दान आया. स्वदेशी का संकल्प लेते समय महिलाओं ने संकल्प किया कि विवाह के समय वह करघे पर बनी हुई बंगाली साड़ी एवं हाथ में कांच की नही, शंख की स्वदेशी चूड़ियां ही पहनेंगी. अंग्रेजों द्वारा निर्मित वस्तुओं के विरोध में भारत में स्वदेशी कंपनियां जन्म लेने लगी. उदाहरण स्वरूप तूतूकुड़ी (तमिलनाडु) में स्वदेशी नेविगेशन जैसी अनेक कंपनियों का जन्म हो गया. लोकमान्य तिलक वंदे मातरम  एवं स्वदेशी के आधार बन गए. वीर सावरकर ने वंदे मातरम बोलकर विदेशी वस्तुओं की होली जलाई. लाला लाजपत राय ने वन्देमातरम् बोलकर लाठी के प्रहार सहन किए. अब ‘आनंदमठ’ से निकलकर ‘वंदे मातरम’ संपूर्ण देश के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ स्वदेशी का भी मंत्र बन गया.
अंग्रेजों के षडयंत्र का परिणाम भी धीरे-धीरे प्रकट हुआ, जो मंत्र देशभक्तों की प्रेरणा बना उसमें कुछ लोगों को बुतपरस्ती नजर आने लगी.1923 के काकीनाड़ा के कांग्रेस के अधिवेशन में तत्कालीन अध्यक्ष मोहम्मद अली ने यह कहकर कि इस्लाम में मूर्ति पूजा एवं संगीत स्वीकार नहीं है, वंदेमातरम् गायन का विरोध किया.| जबकि बदरुद्दीन तैयब, मोहम्मद रहीमतुल्ला सयानी, नवाब सैय्यद मोहम्मद बहादुर, डॉ एम. ए. अंसारी जैसे मुस्लिम अध्यक्षों ने कभी वन्देमातरम् का विरोध नहीं किया. 1915 से सतत वंदे मातरम का गायन करने वाले महान देशभक्त विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने यह कहकर कि यह किसी व्यक्ति नहीं कांग्रेस का मंच है, वंदे मातरम का संपूर्ण गायन किया. लेकिन इस विरोध के कारण कांग्रेस नेतृत्व झुकता चला गया.  पूर्ण वंदेमातरम् के स्थान पर दो ही पदों का गायन प्रारंभ किया एवं  पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा एक पत्र के द्वारा सूचित किया गया कि दो चरण ही गाये जाए एवं अन्य कोई इसके स्थान पर दूसरा गाना भी गा सकते है. 15 अगस्त 1947 को सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम का गायन एवं सरदार पटेल के आग्रह पर आकाशवाणी  पर प्रसिद्ध संगीतज्ञ ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा संपूर्ण वंदे मातरम का गायन हुआ. तत्कालीन नेतृत्व द्वारा अलग-अलग प्रकार के हास्यपूर्ण तर्क देकर वंदेमातरम् के स्थान पर ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का स्थान दिया गया. जिसके संबंध में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा कि मैं ऐसी कांग्रेस की कल्पना भी नहीं कर सकता जो “वंदेमातरम’ को राष्ट्रगान से नकारती है.” धन्य प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, जिन्होंने 24 जून 1950 को दोनों ही गीत वंदे मातरम एवं जन गण मन को राष्ट्रगान का सम्मान दिया एवं सभा की समाप्ति पर सभी ने ‘वंदेमातरम’ कहकर परस्पर अभिवादन किया. अभी-अभी संपन्न हुई 31 अक्टूबर 2025 को एकता परेड में अलग-अलग वाद्य यंत्रों के माध्यम से वंदे मातरम की संगीतमय प्रस्तुति उन सभी प्रश्नों का उत्तर मिलते हुए भी हम सबने देखा है.
विभाजन के जो बीज साम्राज्यवादियों ने हमारे देश में बोए थे एवं अदूरदर्शिता के कारण हमारा जो तत्कालीन नेतृत्व उसमें फंस गया था. वह आज अलगाववादी वृक्ष के रूप में हमारे सम्मुख खड़े हैं. 1947 में भारत के विभाजन की विभीषिका भी हम देख ही चुके हैं. पुनः ऐसा न हो पाए ,हम सांस्कृतिक एकता के आधार पर एकजुट हों इसकी आवश्यकता है. वंदे मातरम गीत उसी सांस्कृतिक एकता का गीत है. वंदे मातरम् की 150 वीं जयंती इसी संकल्प पूर्ति में सहायक बनेगी. इस शुभ अवसर पर संपूर्ण देश आनंद, उत्साह एवं श्रद्धा के साथ राष्ट्रगीत वंदे मातरम  का गायन करे.
शिवप्रकाश
(राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री,भाजपा )

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